सन्त फ्राँसिस के आध्यात्मिक अनुभव पर चिन्तन, पासोलीनी
वाटिकन सिटी
वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 20 मार्च 2026 (रेई, वाटिकन रेडियो): वाटिकन में परमधर्मपीठीय रोमी कार्यालयों के धर्माधिकारियों के समक्ष चालीसाकालीन चिन्तन जारी कर शुक्रवार को उपदेशक फादर पियर पासोलीनी ने असीसी के सन्त फ्राँसिस के आध्यात्मिक अनुभव पर चर्चा करते हुए कहा कि जो कुछ हमें मिला है उसका प्रसार हम अन्यों तक करें।
मिशन
फादर पासोलीनी ने स्मरण दिलाया कि पहले और दूसरे चिन्तन में हमने मनपरिवर्तन और भ्रातृत्व प्रेम की चर्चा की थी किन्तु ये दो गुण अन्तिम या सीमित नहीं हैं क्योंकि ये मिशन में अपनी पूर्ति पाते हैं। अपने आध्यात्मिक अनुभव से सन्त फ्रांसिस ने एक रूपान्तरित संवेदनशीलता पाई थी, उन्होंने अपने भाइयों और बहनों की खुशी की तलाश की, एक ऐसे ईश्वर की खोज की जो खुद को खाली करके प्रेम करते हैं, अस्तु, इस प्रेम को अपने तक रखा नहीं जा सकता बल्कि इसे दूसरों तक पहुंचाने की नितान्त आवश्यकता है। यही है जिसे हम सुसमाचार प्रचार का नाम देते हैं।
पाँच चरण
फादर पासोवीनी ने कहा कि असीसी के सन्त फ्राँसिस ने हमें जो रास्ता दिखाया है वह पाँच चरणों में विभाजित हैः शब्द से अधिक गवाही को प्राथमिकता देना, सन्त फ्राँसिस कहते है कि प्रभु ख्रीस्त पहले खुद की घोषणा नहीं करते बल्कि एक परिवर्तित और रूपनातरित जीवन के माध्याम से खुद को उत्पन्न होने देते हैं; कुछ देने की इच्छा से पहले खुद का स्वागत होने देने का रास्ता दिखाते हैं, बिना मांगे जवाबों की उम्मीद किए दूसरों के सवालों का इंतज़ार करने की कला सिखाते हैं, साक्षात्कार और संवाद से लाभान्वित होना सिखाते हैं जैसा कि सन्त फ्रांसिस की मिस्र के सुल्तान की यात्रा से पता चलता है; और अन्ततः, समर्पण का सुसमाचारी विरोधाभास, जो कोई कमज़ोरी नहीं है बल्कि प्रेम का सर्वश्रेष्ठ रूप है— ऐसा प्रेम जो ईश्वर ख़ुद को अन्यों के लिये समर्पित कर देते हैं।
सुसमाचार प्रचार
फादर पासोलीनी ने स्मरण दिलाया कि शुरुआती फ्रांसिस्कन बिरादरी में एक साथ रहने और एक साथ प्रार्थना करने से कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद नहीं थी: दूसरों के साथ अनुभव और सुसमाचार की घोषणा साझा करने की भाइयों में इच्छा उत्पन्न हुई, जैसा कि येसु के प्रथम शिष्यों में हुआ था। येसु के साथ रहकर उन्होंने जो कुछ पाया था उसे वे ख़ुद तक सीमित नहीं रख सकते थे, उसका प्रसार अन्यों तक करना ज़रूरी हो गया था।
इस प्रकार उन्होंने कहा सन्त फ्राँसिस के अनुभव के अनुसार, जीवन में, सर्वप्रथम, सहभागिता आती है, फिर मुक्ति की घोषणा होती है। पहले ईशवचन का चिंतन होता है, फिर उसके बाद ही वचन ईश्वर की मौजूदगी की गवाही देता है। उन्होंने कहा कि यह याद रखा जाये कोई भी व्यक्ति उस चीज़ के बारे में सच में बात नहीं कर सकता जो अभी तक उसके अपने जीवन में जड़ नहीं जमा पाई है।
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