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 वाटिकन के पौल षष्टम भवन में  पासोलीनी का उपदेश सुनते वाटिकन के परमाधिकारी वाटिकन के पौल षष्टम भवन में पासोलीनी का उपदेश सुनते वाटिकन के परमाधिकारी   (ANSA)

एक बहन रूप में पूर्ण आनंद और मृत्यु , पासोलीनी

परमधर्मपीठीय धर्माधिकारियों के समक्ष चालीसाकालीन चिन्तन जारी कर उपदेशक फादर पासोलीनी ने असीसी के सन्त फ्राँसिस द्वारा एक बहन रूप में अनुभव किये गये पूर्ण आनंद और मृत्यु पर चिन्तन किया।

वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 27 मार्च 2026 (रेई, वाटिकन रेडियो): वाटिकन में परमधर्मपीठीय रोमी कार्यालयों के धर्माधिकारियों के समक्ष चालीसाकालीन चिन्तन जारी कर शुक्रवार को उपदेशक फादर पियर पासोलीनी ने असीसी के सन्त फ्राँसिस द्वारा एक बहन रूप में अनुभव किये गये पूर्ण आनंद और मृत्यु पर चिन्तन किया।

सन्त फ्राँसिस मानवता के क़रीब

उपदेशक फादर पासोलीनी ने कहा कि गहन आध्यात्मिक अनुभव के बावजूद असीसी के सन्त फ्राँसिस हमारी मानवीयता बहुत दूर नहीं थे। वे संत इसलिए नहीं बने क्योंकि उन्होंने कुछ खास काम किए बल्कि इसलिए बने क्योंकि उन्होंने सत्य और अकिंचनता के रास्ते पर ईश्वर की खोज की। आध्यात्मिक परंपरा ने उन्हें एक आल्तेर ख्रीस्तुस्त यानि एक दूसरे ख्रीस्त की संज्ञा प्रदान की यानी एक ऐसा इंसान जो अपनी इच्छा से पवित्र आत्मा का स्वागत कर ईशपुत्र येसु जैसा बन गया। इस दुनिया में उनकी यात्रा के दौरान जो मनपरिवर्तन और चंगाई के संकेत मिले वे प्रभु ख्रीस्त में नवजीवन की झलक के अलावा और कुछ नहीं हैं। सेलानो के थॉमस कहते हैं कि अपने आखिरी दिनों में, फ्रांसिस "प्रार्थना करने वाले व्यक्ति नहीं थे बल्कि वे खुद पूरी तरह से जीती-जागती प्रार्थना में बदल गए थे।"

फादर पासोलीनी ने कहा कि असीसी के सन्त फ्राँसिस का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची खुशी वह एहसास नहीं है जो हम तब महसूस करते हैं जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है और जब हम अपने जीवन में आराम का अनुभव करते हैं, बल्कि सच्चे सुख का अनुभव उस समय किया जा सकता है जब हम कठिनाइयों से गुज़र रहे होते हैं, उस समय जब हमारा बहिष्कार और तिरस्कार किया जाता है।

दुख-दर्द के प्रति उदासीन नहीं

फादर पासोलीनी ने कहा कि यह दुख-दर्द के प्रति बेपरवाह होने के बारे में नहीं है। सन्त फ्रांसिस उदासीन दिल नहीं चाहते, बल्कि जानते थे कि सबसे बड़ी तकलीफ में भी मानव का दिल आज़ाद रह सकता है। उनके अनुसार, खुशी खुद को वास्तविकता से बचाने के बारे में नहीं है बल्कि उसे अपनाने का बारे में है, क्योंकि इसी से ख्रीस्तीय जीवन ठोस बनता और हम उस खुशी को संजोना सीखते हैं जो इस बात पर निर्भर नहीं करती कि चीजें कैसे चलती हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि हम उन्हें कैसे जीना चुनते हैं।

उन्होंने कहा कि इस प्रश्न के उत्तर में असीसी के सन्त फ्रांसिस कहते हैं कि हम बुराई से भागें नहीं, न ही उसे नकारें, न ही बुराई का बदला लें, अपितु बुराई को अपने अंदर समा लें, उसे हम उन लोगों तक प्रवाहित न करें जिन्होंने हमें चोट पहुँचाई है। यह एक अति कठिन तथापि स्वतंत्रता देने वाला रास्ता है।

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27 मार्च 2026, 11:18