संत पापाः धर्मविधि गायन में ईश महिमा और विश्वासियों का शुद्धिकरण
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो 14वें अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।
वाटिकन द्वितीय महासभा, सोक्रोस्तुंम कोंचीलुम का छटवाँ अध्याय धर्मविधि के पवित्र संगीत को समर्पित है। यह दस्तावेज कहता है, “वैश्विक कलीसिया में संगीत की परंपरा अपने में एक अमूल्य निधि है, यहाँ की अन्य कलाओं से भी बढ़कर। इस विशेषता का मुख्य कारण यह है कि, जैसे पवित्र गीत शब्दों में पिरोये जाते है, जो समारोही धर्मविधि का अंतरंग भाग बनता है।” यह इस बात को सुनिश्चित करता है कि “अतः पवित्र संगीत को धर्मविधि कार्यो में उतना ही पवित्र माना जाना चाहिए, जितना वह पूजा-पाठ से ज़्यादा जुड़ा हो, चाहे वह प्रार्थना को आनंद से भरता, चित में एकता उत्पन्न करता या पवित्र संस्कारों को अधिक समारोही बनाता हो।” लेकिन कलीसिया सच्ची कला को स्वीकृति प्रदान करती है जिनमें जरूरी गुणों शामिल हों, तथा वह उन्हें दिव्य आराधना में शामिल करती है।”
संगीत धर्मविधि का अहम भाग
संत पापा ने कहा कि यहाँ हम धर्मसभा का आधारभूत शिक्षा को पाते हैं, जो धर्मविधि के अनुष्ठान में संगीत को सुदृढ़ता और गहराई प्रदान करती हैं, जिसकी चर्चा पहले ही संत पियुस दसवें ने अपने मोतू प्रोप्रियो स्वतः से प्रेरित इंटर सोल्लीचीतूदिनेस में किया है। (22 नवम्बर 1902)। संगीत, वास्तव में, धर्मविधि कार्यकलापों का एक भाग है न कि समारोह का एक श्रंगार मात्र ही। धर्मविधि में, गायन और बाध्य यंत्रों की घुन का अर्थ प्रार्थना करना है, अपने हृदय को अपने भाई-बहनों और ईश्वर के संग एक लय में करना है, जहाँ हम अपने को समारोह के रहस्य में सक्रिया रूप से सहभागी करते हैं। विशेष रूप से, संगीत प्रार्थना के प्रभावकारी आयाम को व्यक्त करता है, संत अगुस्टीन कहते हैं, “कानतारे आमातिस एस्ते” अर्थात “गान उससे जुड़ा है जो प्रेम करते हैं”। यह अति महत्वपूर्ण है,क्योंकि यह हमारे हृदय को ईश्वर से मिली कृपाओं के लिए खोलने और उसे उनके अनुरूप बनाने को मदद करता है।
एकता का पोषण
संत पापा ने कहा कि गायन हममें एकता पोषित करता है। यह हमारे हृदयों को जोड़ता है, जहाँ हम अपनी विभिन्नताओं से ऊपर उठते और हरएक को एक स्वर में ईश्वर की महिमा करने हेतु अग्रसर करते हैं। इस भांति, यह कलीसिया को ज्योतिर्मय करती है, एकता की एक प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति जो उसके स्वभाव का अंग है।
कुछ आवश्यकताएं की उत्पत्ति गहरे ईशशास्त्रीय गान की महत्वपूर्णतः से होती है जो धर्मविधि के क्रिया-कलापों का एक अभिन्न अंग है। सर्वप्रथम इसे चाहिए कि वह हर स्तर के जबाव स्वरुप, धार्मिक अनुष्ठान के अनुकूल हो, किसी फैशन या संगीतकार की विशेष संवेदनाओं से परे। इसका स्वरुप, विशेषकर इसका स्वरसंगीत अपने में भद्र और सरल होनी चाहिए, संगीत का स्तर उच्च और सहज, जो क्रियान्वन के योग्य, विशेषकर जब उसे पूरे समुदाय के द्वारा गाया जाना है।
संगीत की आवश्यकताएं
यही कारण है, कि धर्मसभा इस बात पर जोर देती है कि इसके पद सुयोग्य हों, गहरे और साथ ही साथ सहज ही समझ के योग्य, जो धर्मग्रँथ, धर्मविधि की पुस्तकें और कलीसियाई आध्यात्मिक परंपरा से प्रेरित हों। हमें इन बातों पर ध्यान देने की जरुरत है, जिससे प्राचीन सिद्धांत लेक्स ओरेंदी, लेक्स क्रेदेंदी के आयाम अर्थात प्रार्थना के नियम जो विश्वास के नियम हैं, अपने में सजीव रहें और उसका निरंतर विकास हो।
संगीत में सहभागिता के भाव
सक्रोसंतुम कोनचीलियुम विश्वासियों के सक्रिया सहभागिता की विषयवस्तु पर विशेष ध्यान देती है। हमें इस तथ्य को “समझने की जरुरत है... उस विशेष रहस्य के आधार पर जिसका अनुष्ठान किया जा रहा है और दैनिक जीवन में उसका संबंध” (बेनेदिक्त 16वें, प्रेरितिक प्रबोधन, स्क्रामेंतुम कारितातिस, 52) एक “निरंतर परिवर्तन के मनोभाव में जो विश्वासियों के जीवन को चिन्हित करता है।” एक ठोस माध्यम जिसके द्वारा धर्मग्रंथ के संगीत की विशेष भूमिका प्राप्त की जा सकती है, धर्मसिद्धांत इसका एक स्पष्ट उत्तर प्रस्तुत करता है, “उद्घोषणाओं, प्रत्युत्तरों, स्त्रोत, भजनों और गानों के द्वारा लोग सहभागी होने हेतु प्रोत्साहित होते हैं” और “शांतिमय आराधना” पोषित होती है। यह हर व्यक्ति, पुरोहित या विश्वासी को, उन सारे कार्य के लिए प्रेरित करता हो, जो उसकी प्रकृति का अंग और धर्मविधि के सिद्धांतों का भाग हो”।
ग्रेगोरियन गान की महत्ता
संत पापा लियो ने कहा कि धर्मसभा इस भांति समारोह के लिए धार्मिक संगीत की अन्य शैलियों का परित्याग किये बिना ग्रेगोरियन गान को अत्यधिक महत्व देती है। यहाँ हम पाइप ऑर्गन पर दिये जाने वाले खास ध्यान को भी पाते हैं, जबकि अन्य दूसरे वाध्ययंत्रों की भी अनुमति है, “इस शर्त पर की वे यंत्र सुयोग्य हों, या अपने में धार्मिक कार्यों की उपयोगिता हेतु सुव्यवस्थित किये जाते हों, जो ईश-मंदिर के अनुरूप हों, और जो सही अर्थ में विश्वासियों के लिए आध्यात्मिक लाभप्रद हों।”
पारंपरिक वाध्ययंत्र
नवनीकरण की एक विषयवस्तु धर्मसभा के निकट है जिसे हम संस्कृतिकरण स्वरूप पाते हैं, जो पवित्र संगीत को अपने में सम्माहित करता है। इस संदर्भ में विशेष कर, विभिन्न संस्कृतियों में उपयोग किये जाने वाले पारंपरिक वाध्ययंत्र है, धर्मसभा उनके महत्वपूर्णत पर जोर देते हुए उन पर गंभीरता से विचार करने का आहृवान करती है, जैसे कि वे लोगों के धार्मिक और सामाजिक जीवन का अंग बनते हैं। अतः, वहीं दूसरी ओर, “एक धार्मिक मनोभावना” हर किसी के द्वारा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, जहाँ तक हो सकें यह क्रियान्वन के योग्य हो (...) हमें हर तरह के यह कोशिश करे की आवश्यकता है कि लोगों के परांपरिक संगीत, विद्यालयों और धर्मविधियों दोनों क्षेत्रों में प्रोत्साहित किये जाते हों।
संत पापा लियो ने कहा कि धार्मिक संदर्भ में स्कोला कांतोरूम को एक खास भूमिका दी गई है। धर्मसभा प्रेरिताई हेतु वाध्ययंत्रों को प्रोत्साहित करने हेतु निर्देश देती है, जिसमें विभिन्न संगीतों का उपयोग किया जाता हो, और साथ ही विश्वासियों द्वारा गायन में सक्रिया सहभागिता ली जाती है।
संगीतज्ञों से मांग
यही कारण है कि संगीतज्ञ से इस बात की मांग की जाती है कि वह कलीसियाई संगीत का ज्ञान रखता हो और उस विरासत को कायम रखता हो, जो उसे धर्मविधि के लिए नये गीतों को लिखने में प्रेरणा प्रदान करता हो, जबकि वह समकालीन संवेदनशीलता और विभिन्न परंपराओं का सम्मान करता हो, जिससे फैशान की कुरूपता से आराधना शुद्ध की जाये, अरूचिकर अभिव्यक्तयों, अप्रेरणादायक संगीत के पदों से जो समारोह हेतु उचित नहीं है, मुक्त किया जाये, जिससे धार्मिक रचनाओं को गरिमा और उत्कृष्टता की गारंटी प्राप्त हो।”
संत पापा लियो ने कहा कि इन्हीं कारणओं से, धर्मसभा के धर्माचार्यो ने इस बात को प्रोत्साहित किया कि नवशिष्यालयों लघुगुरूकुलों और धर्मसंघियों को प्रशिक्षणालयों में तथा ख्रीस्तीय संस्थानों और विद्यालयों में धर्मविधि के गीतों का अभ्यास और प्रशिक्षण दिया जाये, और इस बात का ध्यान रखा जाये कि संगीतज्ञों और गायकों का धर्मविधि के संबंध में उचित प्रशिक्षण दिया जाये।
प्रिय भाइयो एवं बहनों, धर्मसभों के आचार्यों में धर्मविधि के गीतों के संबंध में एक बृहृद सम्मान था जो कलीसियाई एकता की एक निशानी थी। इस भांति हम अंतियोख के संत इग्नासियुस के सुंदर वचनों से इस धर्मशिक्षा माला की समाप्ति कर सकते हैं, “आप में हर कोई एक गायक दल बनें, जिससे सहमति में सामंजस्यपूर्ण और एकता में ईश्वरीय स्वर को धारण कर, आप येसु ख्रीस्त के संग एक स्वर में पिता का गुणगान कर सकें, जिससे वे आप को सुन सकें, और आप के अच्छे कार्यों में, यह पहचान सकें कि आप उनके पुत्र के सदस्य हैं।
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