संत पापा लियोः पूजन विधि कालचक्र, मुक्तिदायी कार्यों की पुनरुक्ति
वाटिकन सिटी
संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों।
स्क्रोसंतुम कोन्सिलियुम का पाँचवाँ अध्याय वार्षिक पूजन धर्मविधि कालचक्र को समर्पित है, जिसी चर्चा आज हम करेंगे जिससे हर विश्वासी के जीवन में इसके मूल्य की व्याख्या हो सकें।
सर्वप्रथम हमारे लिए यह बात महत्वपूर्ण हो जाता है कि पूजन धर्मविधि कालचक्र में ख्रीस्तीय त्योहारों को रेखांकित करना कलीसियाई भाषा को विस्तृत बनाती है जिसके लिए हम ईश सेवक मठाधीश प्रॉस्पर गुएरेंजर (1805-1875) के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
पूजन विधि-कालचक्र निर्जीव नहीं
संत पापा ने कहा कि विश्व प्रेरितिक पत्र मिदियातोर देई, में संत पापा पियुस 12वें कहते हैं, “यह अतीत की घटनाओं का निर्जीव प्रस्तुतिकरण नहीं है या एक सरल और सिर्फ एक पिछली युग का रेकार्ड मात्र ही। यह हमारे लिए स्वयं ख्रीस्त की उपस्थिति है जो कलीसिया में हमेशा जीवित रहते हैं। यहाँ हम उनके अति करूणामयी यात्रा को पाते हैं जिसे उन्होंने अपने भौतिक जीवन में शुरू किया...इस उद्देश्य से कि वे मानव को अपने रहस्यों के बारे में बता सकें और उन्हें स्वयं अपने में जी सके। उन रहस्यों को हम आज भी हमेशा की तरह उपस्थित और सजीव पाते हैं। पूजन धर्मविधि कालचक्र को इस भांति हमें इस रूप में समझने की जरुरत है कि वह एक निरंतर मुक्ति का नवीनीकृत कार्य है जिसे ख्रीस्त इतिहास में पूरा करते हैं। कलीसिया अपनी इस सामायिक काल चक्र के द्वारा ईश्वर के मुक्ति कार्य संग जुड़ी रहती है, जिससे सभी विश्वासीगण उनकी कृपा से परिपूर्ण हो सकें।
संत पापा लियो ने कहा कि ईश्वर से मिलन, जो हमारे लिए मर कर पुनः जी उठे, वह लक्ष्य है जिसका अनुसरण कलीसिया करती है, जहाँ वह पास्का रहस्य के समारोह को अपने हर गतिविधि के केन्द्र बिन्दु में सम्माहित करती है।
प्रभु का दिन
अतः धर्मसभा के आचार्य, रविवार को “पूरे धर्मविधि काल की नींव और मूल” मानते हैं, “जो वास्ताविक त्योहार का दिन है।” बहुत से आधुनिक भाषाओं में, हम इसके “दियेस दोमिनी” की संज्ञा में इंगित पाते हैं, जो हमारे लिए “प्रभु का दिन” है। यहाँ तक कि उन भाषाओं में जहाँ हम इसे “सूर्य के दिन” स्वरूप इंगित पाते हैं, यह ख्रीस्त से संयुक्ति पर चिंतन हेतु हमें अग्रसर करता है,“वे धार्मिकता के सूर्य हैं”, जो हर व्यक्ति को प्रकाशमान करते हैं।
संत पापा योहन पौलुस द्वितीय, अपने प्रेरितिक प्रबोधन दियेस दोमिनी (31 मई 1998) में शिक्षा देते हुए कहते हैं कि रविवार प्रभु का दिन है, यह कलीसिया का दिवस है, मानव का दिन और अंततः “दिनों का दिन”। संत पापा लियो ने कहा कि “चूंकि रविवार सप्ताहिक पास्का है, यह हमें उस दिन की याद दिलाती है जब येसु ख्रीस्त मृतकों में से जी उठे, यह वह दिन भी है जो हमारे लिए समय के अर्थ को व्यक्त करता है...पुनरूत्थान से फूटना, यह मानव समय से परे जाना, महीने, वर्षो, सदियाँ जैसे की एक दिशा में सधि तीर जो अपने लक्ष्य- ख्रीस्त के द्वितीय आगमन की ओर इंगित करती हो। रविवार हमारे लिए अंतिम दिन, “न्याय के दिन” का पूर्वाभास देता है, जब हम पुनर्जीवित होंगे।
रविवारीय मिस्सा जरूरी
संत पापा लियो ने कहा कि रविवार के पवित्रिकरण हेतु हमारे लिए यह जरुरी है कि हम यूखारीस्त का अनुष्ठान करें। ईश वचनों को सुनना और ख्रीस्त के शरीर में सहभागी होना, जैसे की धर्मसभा के आचार्य कहते हैं, यह एक साथ आते हुए एक होना है, कहने का अर्थ यह विश्वासियों का आनंदमय मिलन है। इस समारोह में, ख्रीस्तीय समुदाय येसु ख्रीस्त के संग अपनी एकता को दृश्यमान बनाते और ख्रीस्त के संग अपने जुड़े होने तथा कलीसिया के प्रति अपनी निष्ठा का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। यह समुदाय अपनी आभासी उस्थिति से बदली नहीं जा सकती है, और न ही इसे हम एक निष्क्रिय मिलन तक ही सीमित कर सकते हैं। धर्मविधि का समुदाय वास्तव में, भाई-बहनों के सक्रिय सहभागिता से पूरी होती है, जिन्हें एक साथ बुलाया जाता है ताकि “ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट किया जा सके, जिन्होंने “येसु मसीह को मृतकों में से जीवित करके उन्हें फिर से जीवन दिया, और एक आशा को बनाये रखा है।”
इस संदर्भ में, संत पापा लियो ने कहा कि मैं हर किसी से आग्रह करता हूँ, कि आप एक बेहतर संभव परिस्थिति की खोज करें जिससे वे भी जो रविवार की धर्मविधि में सहभागी होने हेतु समय नहीं निकाल पाते हैं, उसमें सहभागी हो सकें।
विश्वास और आस्था का संबंध
प्रिय मित्रों, संत पापा ने कहा कि वार्षिक पूजन धर्मविधि कालचक्र का, जो रविवारों के द्वारा विराम दिया जाता है, अपना एक आकर्षक इतिहास है, जहाँ हम कलीसिया के विश्वास और आस्था को गुंथा पाते हैं। वास्तव में, द्वितीय सदी के प्ररांभिक काल से ही सप्ताहिक पास्का समरोह अपने में उस वार्षिक पास्का, “अति समारोही त्योहार” से संयुक्त था, जिसे अति हर्षोउल्लास के साथ पचास दिनों तक मनाया जाता था, जिसकी चरमसीमा पेन्तेकोस्त होती थी, इसकी तैयारी चालीसा काल में ही पश्चताप के मनोभाव से शुरू होती थी। ख्रीस्त जयंती के काल चक्र का विकास, बाद में हुआ जो पास्का कालचक्र की शैळी पर आधारित था, जिसके फलस्वरूप हम शब्द के शरीधारण रहस्य को जीने के योग्य होते हैं, जहाँ हम ख्रीस्त के जन्म और दुनिया में उनके प्रकटीकरण को पाते हैं। कलीसिया इसके उपरांत विभिन्न समयों के अंतराल में कुंवारी मरियम की आराधना को अपने में सम्माहित करती है, जो उनके बेटे के मुक्तिदायी कार्य के एक अविभाज्य बंधन से जुड़ा हुआ है” और “शहीदों और अन्य संतों की स्मृति” जो “स्वर्ग में ईश्वर की माहिमा गाते और हमारे लिए प्रार्थना करते हैं”।
पूजन विधि कालचक्र- संस्कार में शिक्षा
पूजन विधि वार्षिक कालचक्र इस भांति मुक्ति के इतिहास की शिक्षा को संस्कार के रूप में दुहराती है, यह मसीह की प्रतीक्षा से लेकर पास्का रहस्य की पूर्णता और भविष्य में महिमा के पूर्वज्ञान तक विश्वासियों का मार्गदर्शन करती है। इसमें, कलीसिया ख्रीस्त के मुक्तिदायी रहस्य की महत्वपूर्णतः का समारोह, विश्वासियों को पूर्ण गहराई में सहभागी होने के योग्य बनाते हुए मानती है। यही कारण है कि पूजनविधि वार्षिक कालचक्र, सभी प्रेरितिक कार्यों के लिए मुख्य मार्गदर्शिका और महत्वपूर्ण कार्यप्राणली की रुप-रेखा बनती है।
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