संत पापा लियोः कलीसिया की शक्ति पवित्रता से आती है
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो14वें ने स्पेन की अपनी अपनी प्रेरितिक यात्रा के तीसरे दिन स्पेन धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के धर्माध्यक्षों से भेंट की और उन्हें संबोधित किया।
संत पापा ने धर्माध्यक्षों को संबोधित करते हुए कहा कि स्पेन की प्रेरितिक यात्रा के तीसरे दिन आप के संग होना एक बड़ी खुशी की बात है। संसद में राजनीति के प्रतिनिधियों से मुलाकात उपरांत मैं इस अवसर को आप सभों के संग मिलकर एकता को पुनः सुदृढ़ करने की चाह रखता हूँ जैसे की येसु ने अपने प्रेरितों के संग को अपने सुझाव दिये। (मर.6.31)
संत पापा लियो के स्पनी धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के अध्यक्ष के प्रति अपनी कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हुए कहा कि मैं आशा करता हूँ कि मेरे वचन पवित्र आत्मा की वार्ता से प्रेरित होंगे जिसे ईश्वर हमारे द्वारा हमारे भाई-बहनों के लिए करने की चाह रखते हैं। कलीसिया की सिनोडल यात्रा ध्यानपूर्वक सुनने की एक प्रक्रिया है। ईश्वर की आवाज को पहचानना जो कलीसियाई समुदाय की ओर से आती है हमारे लिए मूलभूत गुणों में से एक है।
संत पापा ने कहा कि एक कलीसिया के रूप में आप की वार्ता फलहित होती है जिसे आप विभिन्न रूपों में कर रहते हैं। इसका एक ठोस उदाहरण सम्मेलन का आयोजन है जिसे आप ने किया। संत पापा ने सन् 2020 और सन् 2025 के प्रभावकारी सम्मेलन की ओर ध्यान आकर्षित कराया जिसकी मुख्य विषय थी- “ईश प्रजा का आगे बढ़ना” और “मैं किसके लिए हूँ? प्रेरिताई हेतु बुलाये गये लोगों की धर्मसभा”। इन विषयवस्तुओं के आधार पर विशेष सावलों का जिक्र किया गयाः हम कैसे आज की चुनौतियों का सामना कर सकते हैं? इस चुनौती के नेतृत्व हेतु कौन बुलाया गया है?
इन सवालों के चिंतन में मैं यात्रा के एक चिन्ह को प्रस्तुत करना चाहूँगा जिसका लक्ष्य ईश्वर है, जिसकी ओर हमें अपनी निगाहें उठाने की जरुरत है। यह एक अनोखी यात्रा है चूंकि हम शारीरिक रुप में नहीं चलते लेकिन हम अपने दिलों को उड़ान भरने देना चाहते हैं।
हमारी यात्रा में प्रलोभन
संत पापा ने कहा कि अपनी यात्रा के दौरान हम एक प्रलोभन में पड़ सकते हैं और वह है उन स्थानों, चीजों और जीवन में अटक जाना जिन्हें हम छोड़ते हैं- यह अपने को नम्रता में पवित्र आत्मा, नयी चीजें जिनसे हमारी भेंट होती है खुला नहीं होने के कारण होता है। इस प्रलोभन के संग, हमारे समान हैं जिनके द्वारा हम अपने को व्यर्थ की चीजों से भर देते हैं। वहीं, हम उन बातों को न भूलां जिन्हें हम बहुत सारे प्रवासियों की तकलीफों के कारण सीख है- एक व्यक्ति जो अकेला है, बिना किसी जड़ के और बिना किसी चीज के, जो बहुत अधिक दुःख झेलता और अपने को उस स्थान में स्थापित करने में बहुत कठिनाई का अनुभव करता है जहाँ वहाँ पहुंचता है।
स्वतंत्रता और साहस
संत पापा ने कहा, अतः हमारी यात्रा के प्रथम चरण में, हम स्वतंत्रता और साहस के साथ अपनी चुनौती का समाना कैसे करते हैं, जिससे हम उन संरचनाओं का परित्याग कर सकें जो हमारी मदद नहीं करते हैं, हमारी जरुरतों का जवाब नहीं देते हैं या हमें अपने लक्ष्य से दूर ले चलते हैं, वहीं क्या हम उन चीजों को सुरक्षित रखने का साहस करते जो हमारी मदद करते हैं। इस परिस्थिति में हम ख्रीस्तीय धरोधर अपनी भूमि को याद करना कैसे भूल सकते हैं जिसमें आकर्षक करने की एक बृहृद शक्ति है जो हमें, अपनी सुन्दरता में, गैर-ख्रीस्तीयों तक पहुंचती और उन्हें समृद्धि प्रदान करती है या यहाँ के लोगों को अपने हिलते हुए विश्वास की परिस्थितियों में भी अपनी आध्यात्मिक पहचान से जोड़े रखती है। यह हमारे लिए निसंदेह एक बृहृद चुनौती है जिसका प्रत्युत्तर हम साहस के साथ देने को बुलाये जाते हैं जिससे यह धरोहर अपनी योग्यताओं के अनुरूप अच्छा फल उत्पन्न कर सके।
जीवन मुक्ति का मार्ग
तीर्थयात्रियों के प्रवाधान को एक दूसरी निधि घोषित करते हुए संत पापा ने कहा कि शब्द की रोटी और यूख्रारीस्त हमारे लिए भौतिक आहार से अधिक जरुरी है क्योंकि वे हमारे लिए मुक्ति के मार्ग बनते हैं। हमारे लिए यह महत्वपूर्ण नहीं कि हम कैसे समारोह को अधिक या कम आकर्षित बनाते हैं, बल्कि यह उनमें हमारी सहभागिता की अनुभूति कैसी होती है, क्या हम उन्हां जीवन के अंग बनाते हैं, क्या उनकी अनुपस्थिति हमारे लिए शारीरिक भूख से अधिक बेचैनी का कारण बनती है। संस्कारीय जीवन हमारे अस्तित्व की लय को गति प्रदान करती है, उसी भांति जैसे एक बालक अपनी माता से पोषित किया जाता है या जैसे कोई एथलीट समाप्ति रेखा तक पहुंचने के लिए ज़रूरी ताकत का अंदाज़ा लगाता है।
वार्ता में कठिनाई के कारण
संत पापा ने दूसरों के संग वार्ता को यात्रा में उठने वाली कठिनाई घोषित किया। उन्होंने कहा कि इसके कई कारण हो सकते हैं, भाषा और संस्कृति की विभिन्नता, अपरिचित होने के कारण अविश्वास या लड़ाई और नसमझी जो हमारे निकटवर्तियों के मध्य उत्पन्न होती है। “हम दूसरों के लिए अपने को व्यक्त करने या दूसरे को समझने हेतु कठिनाई का अनुभव करते हैं।” हम सुसमाचार की घोषणा में, दूसरों का स्वागत, दुनिया के सवाल का उत्तर देने या दूसरे समुदायों के सदस्यों के संग प्रेरिताई के संबंध में उत्तरदायित्वों को साझा करने के संबंध में इसे लागू कर सकते हैं। हमने पहले ही कहा है कि हम उन चीजों का परित्याग करें जो हमें पीछे की ओर खींचते हैं, यहाँ हमारी विरासत हमें दिशा-निर्देशित करती है जिसके द्वारा हम मार्ग में मिलने वालों के साथ वार्ता करते हैं।
संत पापा ने कहा कि हम इसे कैमिनो दे सांतियों के तीर्थयात्रियों में पाते हैं। हमारी यात्रा में हम अपने सामने उन विशाल और खालो मैदानों को देखते हैं। तीर्थयात्रियों में हम कुछ बुज़ुर्गों या विदेशी काम करने वालों को देखते हैं जो कई सामाजिक स्थितियों के लिए एक उदाहरण के तौर पर उपयोग किये जा सकते हैं, जो दुर्भाग्य से, हमारी कलीसिया की सच्चाइयों को व्यक्त करते हैं। यह पहली बार नहीं है जब स्पेन ने ऐसी स्थिति का सामना किया है: उदाहरण के लिए, पहले भी, जब कलीसिया को गर्म भूमि में अपनी उपस्थिति फिर से तैयार करनी पड़ी थी, जहाँ सुसमाचार प्रचार की शैलियाँ उत्पन्न हुई जिन्हें बाद में अमेरिका भेजा गया, वे यहाँ हमारी प्रेरिताई में हमारी मदद कर सकते हैं।
संत पापा ने कहा हमें भी वार्ता के माध्यम और नयी भाषाओ के उपयोग द्वारा एक नई स्वरूप का निर्माण करने की जरुरत है। जैसे ग्रेनेडा के मशहूर “पवित्र मुफ़्ती”, फ्रायर हर्नांडो डे तालावेरा, और बाद में अमेरिका में संत तोरिबियो डे मोग्रोवेजो, एक अनुकरणीय धर्माध्यक्ष जो प्रेरिताई और कलीसिया के पुनर्गठन के समय दूसरों तक पहुंचे, जिनकी संत घोषणा की तीसरी शताब्दी हम मना रहे हैं। हालांकि इस डिजिटल युग में भाषाएं अलग हैं और वो संस्कृतियां अब हमारी वास्तिवका का अंग हैं – दुनिया के सभी भागों से आए प्रवासियों के संग – वे भी बदल गई हैं, लेकिन हमारे कार्य करने के तरीके को यथावत बने रहना चाहिए।
कार्य करने के स्वरूप
संत पापा ने कार्य करने का जरूरी बातों की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कहा कि सर्वप्रथम हम वार्ता करने की योग्य रखें, हर सत्य को घोषित करने की जो हमारे प्रांत में हैं, अपने को नम्रता में बनाये रखना जिससे हम न केवल समझते हों बल्कि उसके साझा करते हों। अपनी विरासत में व्याप्त सारी चीजों को जमा करते हुए हम एक सच्चाई का निर्माण कर सकते हैं जो विश्वास को अपनी गहराई तक ले जाती है। इसे स्वाभाविक रुप में करने हेतु हमें चाहिए कि हम दूसरों की भाषा को सीखें, हम अपनी ओर से पहल करें और दूसरों के संग अपने को संलग्न करें जिससे ईश्वरीय राज्य के बीज बोये जा सकें। उन सच्चाई का निर्माण करना जो स्वयं अपने विश्वास की अनुभूति का संचार कर सकें- जैसे जैसा कि तोरिबियो ने किया था- ग्रेनाडा से लेकर अमेरिका तक के अनुभव, अर्थात अपने में उन संसाधनों को वहन करना जो हर हालात में सुसमाचार प्रचार की नई चुनौतियों का खुले दिल से सामना करने में मदद करते हों।
सुनसान मैदानों के बाद, हम बड़े शहरों से भी मिलेंगे, जहाँ शांति और दूरी नहीं बल्कि हम व्यक्तिगत मिलन को पाते हैं। हमारे लिए उत्तर अलग-अलग होंगे, लेकिन उन तक पहुँचने के तरीके एक जैसे होंगे: सुनना, समझना, सम्मान, उदारता और खुलापन।
संत पापा ने कहा कि तीर्थयात्री अक्सर रात में निकलते हैं, और रास्ते का शुरुआती अंधेरा अक्सर उन्हें डरा सकता है। शाम की प्रार्थना का भजन, “रात मुक्ति का समय है,” हमें याद दिलाती है कि अगर हम अच्छी संगति में हैं, तो यात्रा की मुश्किलें और खो जाने का खतरा कम हो जाता है। यह प्रभु हैं जो हमें आगे ले चलते हैं; वे इतिहास और हमारी हर कहानी के स्वामी हैं। वे लय तय करते हैं। हम उनके पीछे चलते हैं; असल में, हम एक शरीर के सदस्यों स्वरूप उनके साथ चलते हैं। कलीसिया के संग यह गहरा संबंध, इस बढ़ते हुए ध्रुवीकरण और विरोध के समय में, विविधता में एकता के साक्षी होने की मांग करता है: एक ऐसा मिलन जो उन उपहारों, आदर्शों और भावनाओं की समृद्धि के आलिंगन में हमें सक्षम बनाता है, जो पवित्र आत्मा से लोगों में उत्पन्न होती है। ख्रीस्त की छवि कलीसया के जीवित भित्तिचित्र में दिखाई देती है, जहाँ कई खपड़ा, एक साथ मिले बिना, प्रभु की सुंदरता को व्यक्त करती है।
धर्माध्यक्षों की भूमिका
संत पापा लियो ने कहा कि इस कार्य को करने में धर्माध्यक्ष की एक मुख्य भूमिका होती है। हम अपने में एक दृश्यमान निशानी होने के लिए बुलाये गये हैं- सर्वप्रथम ईश्वर के संग एकता, अपने विश्वास की प्रेमपूर्वक सुरक्षा करना, ईश वचन और कलीसिया की जीवित संस्कृति के प्रति विनम्र बने रहना। दूसरा संत प्रेत्रुस के उत्तारिधारी और वैश्विक कलीसिया, धर्मप्रांत के पुरोहित और समुदाय के संग, समर्पित जीवन, संघों, संगठनों के माध्यम और हर सच्चे आदर्शों से जुड़े रहना जिसे जनसामान्य की भलाई हेतु पवित्र आत्मा प्रदान करते हैं। संत पापा ने कहा कि आपकी प्रेरिताई एकता स्थापित करने, वार्ता को बढ़वा देने, विभाजनों की चंगाई और सेवा हेतु सौंपे गये लोगों के संग साथ चलने की मांग करती है।
मैं किसके लिए हूँ?
संत पापा लियो ने कहा कि आप को येसु ख्रीस्त से जुड़े रहने की निशानी बनने का आहृवान किया जाता है- एकता में चलते हुए अपने भाई-बहनों के पास पहुंचना- यह हमें एक और चुनौती के सामने खड़ा करता है जो आज कई लोगों के दिलों का स्पर्श करती है। बहुत से युवाओं के लिए- और सिर्फ़ उनके लिए ही नहीं- यह सवाल, “मैं किसके लिए हूँ?” यह हमारे निष्ठा में अपने जीवन के अर्थ की खोज करने को अग्रसर करता है जहाँ हम अपने जुड़े होने और स्वयं को देने के अर्थ को पाते हैं। मानव का हृदय अनुभवों, संभावनाओं या क्षणभंगुर सुरक्षा की भावना को संग्रहित करने से नहीं भरता; यह तब भरता है जब हम अपने बुलावे के मर्म को समझते हैं, जब हम इस बात को समझते हैं कि जिंदगी की पूर्णतः केवल तब आती है जब हम उसे देते हैं।
संत पापा ने कहा कि यही कारण है कि बुलाहटीय प्रेरिताई को संख्यों तक सीमित नहीं किया जा सकता है। यह सजीव समुदायों से उत्पन्न होती है, आनंदमय पुरोहितों, उन परिवारों से जो निष्ठा का साक्ष्य देने के योग्य होते हैं। कलीसिया के द्वारा इस बात का साक्ष्य देना कि सरलता में ख्रीस्त का अनुसरण करना हमारे जीवन को दरिद्र नहीं बनता है, बल्कि उसे विस्तृत करता है। सुसमाचार जहाँ आनंद, सेवा और एकता में जीया जाता है वहाँ हम येसु ख्रीस्त में एक नये जीवन की प्रतिज्ञा को पाते हैं।
आज की जरूरत
जीवन के लिए सिर्फ जरुरी चीजों को लेने के संबंध में संत पापा लियो ने संत पापा फ्रांसिस की बातों की याद दिलाते हुए कहा कि संरचनाओं की सुरक्षा को हम अच्छी बुलाहट के आगे नहीं रख सकते हैं। गुरूकुल के विद्यार्थियों को बेहतर प्रशिक्षण का अधिकार है, और यह कलीसिया का अधिकार है कि वे बेहतर प्रशिक्षित पुरोहितों को अपनायें। गुरूकुल वासियों को चाहिए कि उन्हें प्रार्याप्त समुदाय का अनुभव प्राप्त हो, उन्हें प्रशिक्षण देने वाले अध्ययन और शिक्षण में पूर्ण समर्पित हों, उन्हें आध्यात्मकि निर्देशन में सहचर्य का अनुभव हो, उन्हें ईशशास्त्रीय ज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त हो, जिससे वे अपनी प्रेरिताई को योग्यता में पूरा कर सकें। इसके लिए, न सिर्फ़ मिलकर काम करना ज़रूरी है, बल्कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर काम करने हेतु सीखने की भी ज़रूरत है।
कठिनाई अवसर बनें
संत पापा ने कहा कि इस संदर्भ में हम कठिनाइयों को अवसर के रुप में देख सकते हैं। कभी-कभी, हमें कलीसिया के कार्य और जीवन के संबंध में लोकधर्मियों के काम और ज़िंदगी को समझाने में मुश्किल लगता है। दूसरी ओर,कितनी सारी प्रेरिताई हैं जो लोकधर्मी और धर्मसंघी की देख-रेख में की जाती है। यह एक ऐसी कठिनाई है जिसे हम मिलन, वार्ता और संचार के मौके में बदल सकते हैं। यह सुनिश्चित करना हमारी ज़िम्मेदारी है कि वे लोग इस कलीसियाई सेवा में अपनी भागीदारी को ईश्वर का बुलावा समझें, ख्रीस्तीय के रूप में अपनी ज़िम्मेदारी निभाएं, अपने को प्रेरिताई का हिस्सा समझें जिसे ईश्वर ने उन्हें सौंपा है।
संत पापा ने कहा कि हमारी यात्रा मिलन से बनती है, जहाँ हम उन लोगों से मिलते है जो जीवन के अँधेर से होकर गुजरते और हमें भला समारी होने की मांग करते हैं। इस मिलने की एक दुःखद बात यह है कि उनमें से कई लोगों ने अपने को याजकों द्वारा घायल किया गया पाया है। इस मुसीबत का सामना करते हुए, कलीसिया को उन्हें सुनने, सत्य को देखने, न्याय, मुआवज़े और रोकथाम तथा देखभाल की संस्कृति को अपने की जरुरत है। हमें हर घायल व्यक्ति को ईमानदारी से सुनने, स्वागत करने, सुरक्षा और चंगाई हेतु सही मार्ग को चुनने की जरुरत है।
लोगों की प्यास
यही तर्क भौतिक दुनिया की चुनौतियों पर भी लागू होता है। हमारे समय के कई पुरुष और महिलाएं सीधे तौर पर ईश्वर को नहीं नकारते हैं; बहुधा उनके दिल में, सच्चाई, अपनेपन और उम्मीद की गहरी प्यास होती है। कलीसिया इन चाहतों को पहचानने, उन्हें सम्मान के साथ सुनने और उसे सौंपे गए खजाने को देने के लिए बुलायी गयी है - जैसा कि पेत्रुस और योहन ने येरुसालेम मंदिर के फाटक पर लकवाग्रस्त व्यक्ति को दिया था: ( प्रेरितों 3:1–10)। जब हम दूसरे धार्मिक या सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर काम करते हैं, तो कलीसिया कभी भी अपने को बंद नहीं करती विशेष कर ईश्वर के प्रेम को साझा करने में। इस तरह, सुसमाचार द्वारा उत्पन्न करूणा अपने में एक प्रतिज्ञा को वहन करती है जो व्यक्ति के सम्मान को प्रेम में स्थापित करता है।
कलीसिया की शक्ति
संत पापा ने कहा कि हम संत पापा योहन पौलुस द्वितीय के द्वारा घोषित “मरियम की भूमि” में यात्रा कर रहे हैं। मरियम में हम अपने लिए महान निधि को पाते हैं क्योंकि वे हमें अपने जीवन के द्वारा ईश्वर का स्वागत करने और उन्हें अपने हृदय के निकट रखने की शिक्षा देती हैं। वे हमें शिष्यों के रुप में एक साथ चलने, कलीसिया की यात्रा में दूसरों के लिए उपस्थित रहने का पाठ पढ़ाती हैं। संत पापा ने कहा कि मैं उनके हाथों में आप की प्रेरिताई को समर्पित करता हूँ, “वह आप को सुसमाचार का गुप्त खमीर बनने में मदद करें।” कलीसिया की शक्ति संसाधनों की महान में नहीं होती है बल्कि उनकी संतानों की पवित्र होने में होती है, जहाँ प्रेरितों के रुप में हम एकता में बन रहते हैं, यह नम्रता और अपनी निष्ठा बनाये रखने में आती है जहाँ हम अपने को आत्मा के द्वारा निर्देशित होने देते हैं।
इस यात्रा में संत पापा ने अवीला के संत योहन, स्पानी धर्मसंघियों के संतरक्षक संत की विचवाई की। संत पापा पौल 6वें ने उन्हें “आध्यात्मिक जीवन हेतु एक हितौषी और विवेकी शिक्षक घोषित किया जो एक साधारण पुरोहित रहे। कलीसिया के उस आचार्य में कलीसिया के हर धर्माध्यक्ष को अपनी कलीसिया की सुरक्षा और उसे पोषित करने का आहृवान किया जाता है।
संत पापा लियो ने कहा कि उनकी ओर देखते हुए हम अपने को ख्रीस्त के प्रेम में, प्रार्थना, कलीसिया के प्रति विश्वासी, लोकधर्मियों के निकट, अच्छी शिक्षा,प्रेरितिक उत्साह और प्रेरितिक कार्य से पुष्ट करें। पुरोहिगतगण धर्माध्यक्षों में सिर्फ एक अधिकारी को नहीं पाते बल्कि एक पिता को जो सदैव उनके संग चलते हैं, और दूसरे पुरोहितों में, भाइयों को जिनके संग वे अपने जीवन की कठिनाइयों और इस यात्रा की खुशी को साझा करते हैं जिनमें हम ख्रीस्त की खोज करते हैं।
आइए हम इस आध्यात्मिक यात्रा को पवित्र आचार्य की प्रार्थना के साथ खत्म करें, जो हमें याद दिलाते हैं कि हर कलीसिया का नवीनीकरण ख्रीस्त के हृदय से उत्पन्न होता है: “हे प्रभु, अगर आप मुझे वही करने की आज्ञा देते हैं जो आपने किया, तो मुझे अपना हृदय दें”। हम भी यही विनती करें-: हे प्रभु, हमें अपना हृदय दें, ऐसा हृदय जो आपकी ओर देख सके, यात्रा पर निकल सके, सुन सके, समझ सके, सेवा कर सके, प्यार से सुधार सके, सब्र से ध्यान दे सके और खुशी से घोषणा कर सके। क्योंकि जो कलीसिया ख्रीस्त के हृदय को स्वीकार करती है, वह अपने संग आग के खंभें को वहन करती है जो उसे रास्ता दिखाती है, उसे सहारा देती है, उसकी रक्षा करती है और उसे दिलासा देती है — किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए ज़रूरत की चीज़ें को।
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