संत पापा लियोः विश्वास और खुशी में सांत्वना की अनूभूति
वाटिकन सिटी
संत पापा ने सभों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एंव बहनों सुप्रभात और सुस्वागतम।
उन्होंने कहा कि मैं आप सभों के संग पिछले सप्ताह स्पेन, मैड्रिड, बारर्सिलोना, मोंनसेरात और कनारी द्वीप की प्रेरितिक यात्रा पर अपने चिंतनों को साझा करना चाहूंगा।
अफ्रीकी चार देशों की अपनी लम्बी यात्रा करने के बाद इस समय मैंने एक यूरोपीय देश की एक प्राचीन और ख्रीस्तीय परंपरा की समृद्धि से अपने को सराबोर किया। और ऐसा प्रतीत हुआ कि वर्तमान समय के स्पेन ने, जिसने अपने में एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों का अनुभव किया है, हर जगह संत पापा का आतिथ्य जोश और सुनने की उत्सुकता से किया। इसके लिए मैं ईश्वर का और पूरे स्पानी लोगों, राजा और नागर अधिकारियों, धर्माध्यक्षों और कलीसियाई समुदायों के प्रति अपनी कृतज्ञता के भाव व्यक्त करता हूँ।
आनंद की अनूभूति
संत पापा लियो ने कहा कि ईश्वर के लोगों ने मुझे अपने विश्वास और प्रेम की आनंदपूर्ण अभिव्यक्ति में बृहृद सांत्वना प्रदान किया। अपनी ओर से मैंने, रोम के धर्माध्यक्ष स्वरुप विश्वासियों को प्रोत्साहित करते हुए इस बात की सुनिश्चितता प्रदान की कि वे एकता को बढ़ावा देते हुए, वार्ता और विभिन्नताओं में एकता के माध्यम से हर तरह के विभाजन और संघर्ष पर विजय प्राप्त करें। यह संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी की एक विशेष सेवा है, एक सेवा, जो हर समय उन देशों की कलीसियाई और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने में एक विशेष अभिव्यक्ति को प्रकट करती है।
येसु पर नींव
स्पेन के संबंध में, संत पापा ने कहा कि मैंने इस बात को देखा कि हर उम्र के कितने ही लोगों ने संत पापा की प्रेरितिक यात्रा का खुशी में इंतजार कियाः हर जगह मैंने असंख्य लोगों की भीड़ देखी जिन्होंने बहुत ही गर्भजोशी से मेरा स्वागत किया। हम इस सच्चाई को नकार नहीं सकते हैं और यह हमारे लिए विचारनीय है। निःसंदेह इस तरह की सहभागिता हमारे लिए सर्वप्रथम स्पानी लोगों के विश्वास को प्रकट करती है, संत पापा ने कहा। उन्होनें कहा कि वहीं मैं यह विश्वास करता हूँ यह इस तथ्य को प्रकट करती है, कि यह एक सच्ची और गहरी नींव पर एकता पाने की बड़ी ज़रूरत को व्यक्त करता है, जो न तो सोच पर आधारित है और न ही किसी खास फ़ायदे पर ही। यह नींव आखिरकर हमें येसु ख्रीस्त में प्राप्त होती है, जिसे हम सुसमाचार के जरूरी सांस्कृतिकरण के माध्यम लोगों के जीवन में प्रसारित कर सकते हैं। यह ऐसा कर सकता है क्योंकि इसका संदेश दोनों जरूरतों का प्रत्युत्तर देता है- एक सच्चाई की खोज और दूसरा न्याय की प्यास।
प्राचीनता और आधुनिकता का समावेश
मैड्रिड और बारर्सिलोना में, हमारी भेंट एक बड़े महागिरजाघर के साथ-साथ एक आधुनिक स्टेडियम में हुई। हमने मोंनसेरात के अब्बे में रोजरी बिन्ती की। हमने साग्रदा फामिलिया में ख्रीस्तीयाग अर्पित किया जो एक शानदार निशानी, पत्थरों और दीप का मधुर मिलन है, अपने में हरएक को ख्रीस्तीय रहस्य के बारे में कहता है। प्राचीनता और आधुनिकता का यह मिलन, ख्रीस्तीय परंपरा और समकालीन परंपरा ने मुझे यूरोप के असली रूप, उसकी बेशुमार दौलत को, एक जीवित सच्चाई के तौर पर, न कि पुरानी बातों के रूप में देखने का एक अवसर प्रदान किया। यह एक धरोहर है जिसकी हमें सावधानीपूर्वक रक्षा करने की जरूरत है जिससे यह आज की वैश्विक दुनिया में महत्वपूर्ण चुनौतियों-शांति, सामग्र पारिस्थितकी, सामान्तर और सतत विकास तथा मानवीय सम्मान के आधार पर उपयोग में लाया जा सके। ये वे सारी चुनौतियाँ हैं जिसे वाटिकन द्वितीय महासभा ने पहले ही स्पष्ट रुप में चिन्हित किया था, और जिसके संबंध में कलीसिया के धर्मसिंद्धात ने बाद में जिक्र किया तथा वर्तमान में जिसकी चर्चा विश्व पत्र मानिफिका ह्यूमानितास करता है, जिसका लक्ष्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समय में मानव की सुरक्षा करना है।
सुसमाचार में आशा का संदेश
संत पापा लियो ने कहा कि विभिन्न मिलनों के द्वारा मैंने संत पापा के विचारानुरूप आज की मानवता में सुसमाचार की आशा को सुनने की जरुरत को पाया, जो विकास के नकारात्मक स्वरूपों द्वारा हो रहे बुरे नतीजों से बुरी तरह परेशान है। यह आवश्यकता, जो विभिन्न साक्ष्यों में अभिव्यक्त हुई जिन्हें मैंने सुना, जो कभी-कभी हमें प्रभावित करती तो कभी शिक्षा प्रदान करती हैं- इस जरूरत को मैंने छोटे और गरीबों के चेहरों में भी देखा जिनसे मेरी मुलाकात हुई- पल्ली का वह बालक जिसने अपनी चिठ्टी मेरे लिए पढ़ी, कुछ दुराचार के शिकार, जो अपने को सुने जाने का मांग करते हैं, कैदखाने के वे बंदी जिन्होंने मेरा इंतजार किया, युवा जो अपने को चिंता और आशाओं से भरा पाते हैं, आतिथ्य क्रेन्द कनारी द्वीप के प्रवासीगण।
कनारी द्वीप का पड़ाव
संत पापा लियो ने कहा कि कनारी द्वीप-हमारी यात्रा का अंतिम पड़ा था- जहाँ मुझे एक व्यापक जानकारी दी गई। मुझे द्वीप समूहों की एक ओर भौगोलिक जानकारी मिली तो दूसरी ओर स्थानीय कलीसिया के द्वारा सच्चाई से अवगत कराया गया जो एक बृहृद संख्या में बाध्य प्रवासियों का स्वागत करते हैं, जो मुख्यतः अफ्रीका से आते हैं। हम जानते हैं कि प्रवासन की घटनाएँ अपने में जटिल हैं और उसके लिए संगठित और सहयोगिक कार्य परियोजनाओं की जरुरत है। लेकिन यह परिभाषा हमारे लिए एक अलग, विस्तृत दृष्टिकोण को खोलती है- यह हमें यह समझने के योग्य बनाती है कि कैसे हम आज की दुनिया में सुसमाचार का पुनः अध्ययन करने को बुलाये जाते हैं, एक-दूसरे के संग किस तरह अपने संस्कृति के उपाहर को साझा करते हैं, और उन सारी चीजों में विशेष कर ख्रीस्त के कौन-सा संदेश फलहित होते हैं। बहुत से फलों में हम इसमें विशेषकर एक फल- लोगों और देशों के बीच वार्ता को पाते हैं, भातृत्व की भावना में मिलन जो हमें एक-दूसरे के मूल्यों को पहचानने और उनकी प्रशंसा करने में मदद करता है। यह अपने में एक सहज मार्ग नहीं है, यह हमसे सद्भावना और ईश्वर से सहायता की मांग करती है, लेकिन यह हमारे लिए एक मार्ग है जो हमें प्रेम की सभ्यता के मार्ग में अग्रसर करता है।
अपनी आंखें उठायें
संत पापा लियो ने कहा कि मेरी प्रेरितिक यात्रा के आदर्श वाक्य “अल्जाद ला मीरादा” “अपनी आँखों को उठायें” था। ये येसु के शब्द हैं जिसे उन्होंने अपने प्रथम शिष्यों को संबोधित करते हुए कहा, जिससे वे लोगों और भीड़ में जीवन, सच्चाई और पूर्णतः की चाह को देखने के योग्य हो सकें। उन्होंने कहा कि ईश्वर उन शब्दों को मेरे लिए भी कहते हैं और उनकी कृपा से मैंने इस प्रेरितिक यात्रा में उसका अनुभव किया है। आज मैं आप सबों को निमंत्रण देना चाहूँगा कि हम अपनी आँखें उठायें। हम अपने पड़ोसी की ओर, लोगों और दुनिया की ओर “येसु की निगाहों” से देखना सीखें अर्थात प्रेम, सम्मान और करूणा की भावना से।
संत पापा ने अपनी धर्मशिक्षा के अंत में उन सभों के प्रति कृतज्ञता के भाव व्यक्त किये जिन्होंने इस प्रेरितिक याक्षा की सफलता हेतु प्रार्थना कीं, विशेष कर स्पेन के मठवासी धर्मबहनों के लिए हम ईश्वर का धन्यवाद करते हैं, उनकी संख्या बहुत है। संत पापा ने कहा कि आप निरंतर प्रार्थना करना जारी रखें, जिससे कुंवारी मरियम की मध्यस्थता द्वारा, वह बीज अत्यधिक फल उत्पन्न कर सके जिन्हें मैंने बोया है।
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