संत पापा लियोः रोजरी सुसमाचार की पूर्णता
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो ने नाप्पोली की एक दिवसीय प्रेरितिक यात्रा में पोम्पेई मरियम तीर्थ में मिस्सा बलिदान अर्पित किया।
संत पापा ने अपने प्रवचन में कहा कि “मेरी आत्मा ईश्वर का गुणगान करती है।” इन शब्दों के द्वारा हमने प्रथम पाठ के प्रत्युत्तर में भजन स्वरूप गया, ये शब्द कुंवारी मरियम के हृदय से निकलते हैं जब वह अपने गर्भ के फल को मुक्तिदाता येसु को एलिजबेद के सामने प्रस्तुत करती है। उनसे बाद योहन बपतिस्ता के पिता जकरियस और बुजुर्ग सिमियोन ईश्वर की महिमा का गान करते हैं। इन तीन भजनों को हम प्रतिदिन कलीसिया की वंदना प्रार्थना में करते हैं। वे इस्रराएल की निगाहें हैं जो प्रतिज्ञाओं को पूरा होता पाते हैं, वे कलीसिया की निगाहें हैं, वर जो अपनी दिव्य वधू के पास जाता है, वे स्पष्ट रूप में मानवता की निगाहें हैं, जो मुक्ति की चाह में एक उत्तर को पाते हैं।
ख्रीस्तीय मूल्यों का संरक्षण
एक सौ पचास साल पहले, इस तीर्थयात्रा पर पहला पत्थर रखा गया था, जहाँ 79 ई. में वेसुवियस के विस्फोट ने एक महान सभ्यता की निशानियों का नमोनिशन मिटा दिया था। ऐसी परिस्थिति में संत बारतोलो लोंगो ने अपनी पत्नी, काउंटेस मारियाना फर्नारो डी फुस्को के साथ मिलकर न केवल एक गिरजाघर, बल्कि पूरे मरियम शहर की नींव रखी। इस तरह उन्होंने ईश्वरीय की योजना के बारे में अपनी चेतना को अभिव्यक्त किया, जिसे संत जोन पौल द्वितीय ने 7 अक्टूबर 2003, रोज़री साल के अंत में, इसे कृपा की जगह निरूपित करते हुए नव सुसमाचार की घोषणा के संबंध में कहा, “आज” जैसे पुराने पोम्पेई के समय में था, एक ऐसे समाज में ख्रीस्त का प्रचार करना ज़रूरी है जो अपने को ख्रीस्तीय मूल्यों से दूर कर रहा है और उसकी यादें को भी खो रहा है।"
संत पापा के मतलब
संत पापा लियो ने कहा कि ठीक एक साल पहले, जब मैंने संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी की प्रेरिताई शुरू की, यह पोम्पेई की पवित्र कुंवारी से निवेदन रोजरी प्रार्थना का दिन था। यही कारण है कि मैं यहाँ आता हूँ, अपनी सेवा को पवित्र कुंवारी के चरणों में अर्पित करने हेतु। उन्होंने कहा, “लियो के नाम का चुनाव करते हुए मैं संत पापा तेरहवें के पद चिन्हों का अनुसरण करता हूँ जिन्होंने अन्य भक्तियों के अलावे पवित्र रोजरी के धर्मसिद्धांत का विकास किया।” इन सारी चीजों के साथ ही हम संत बारतोलो लोंगो रोजरी के प्रेरित की संत घोषणा को पाते हैं जो हाल ही के दिनों में सम्पन्न हुआ। यह संदर्भ हमारे लिए ईश्वर के वचनों पर चिंतन करने का एक विशेष अवसर देता है जिसे हमें अभी-अभी सुना है।
आनंद का निमंत्रण
आनंद के सुसमाचार की घोषणा हमें उस परिस्थिति से वाकिफ कराती है जब ईश्वर का वचन मरियम के गर्भ में देहधारण किया। उस गर्भ से वह ज्योति प्रस्फुटित होती है जो इतिहास और दुनिया को सम्पूर्ण अर्थ प्रदान करती है स्वर्गदूत ग्रबियेल के द्वारा कुंवारी मरियम को दिया गया अभिवादन आनंदित होने का निमंत्रण है, “प्रणाम, प्रभु की कृपापात्री।”(लूका.1.28) संत पापा ने कहा, “हाँ, प्रणाम मरियम हमारे लिए आनंदित होने का एक निमंत्रण है, यह मानवता की विध्वंस परिस्थिति में जहाँ हम पाप के कारण शोषण, सतावट और युद्ध को पाते हैं, ईश्वर की करूणा हमारे लिए येसु ख्रीस्त के रुप में आती है।” मरियम हमारे लिए करूणा की माता बनती हैं। वे वचन की शिष्या और शरीरधारण का साधन बनती और हमारे लिए सच्चे अर्थ में अपने को “कृपा से परिपूर्ण” व्यक्त करती हैं। हम उनमें हर चीज को कृपा स्वरुप पाते हैं। ईश्वर के शब्द के लिए अपने शरीर को अर्पित करने के द्वारा, जैसे कि द्वितीय वाटिकन महासभा हमें बतलाती है, “वे ख्रीस्त के सदस्यों की माता बनाती हैं...क्योंकि वे करूणा में कलीसियाई विश्वासियों के संग सहयोग करती हैं, जो उस सिरमौर के सदस्यगण हैं।” मरियम के “हाँ” में न केवल येसु का जन्म होता है बल्कि हम कलीसिया के जन्म को भी देखते हैं और मरियम इस भांति ईश्वर की माता, थियोटोकस और कलीसिया की माता दोनों बन जाती हैं।
रोजरी का रहस्य
संत पापा ने कहा कि यह एक अद्वितीय रहस्य है। हम सारी चीजों को पवित्र आत्मा की शक्ति में पूरा होता पाते हैं जो मरियम में उतरते और उनके कुवांरे गर्भ को फलहित करते हैं। इतिहास का यह क्षण अपने में अति सुन्दर और शक्तिशाली है जो हृदय को आकर्षित करता और इसे पवित्र रोजरी प्रार्थना की उत्तप्ति में अपनी चरम प्रदान करता है। यह द्वितीय शताब्दी की एक वह प्रार्थना बनती है जिसकी जड़े मुक्ति इतिहास से जुड़ी हैं, और जिसका संदर्भ स्वर्गदूत के संबोधन में मुख्य रूप से आधारित है। “प्रणाम मरियम” रोजरी में इस प्रार्थना को दुहराना स्वर्गदूत के संबोधन को प्रतिध्वनित करता है, जो सदियों तक फैली है और विश्वासियों की निगाहों को येसु की ओर बनाये रखती है, जहाँ हम माँ की आंखों और निगाहों को पाते हैं। रोजरी बिन्ती के रहस्यों में हम येसु की आराधना, मनन-चिंतन करते हैं, जिसके फलस्वरूप हम संत पौलुस की भांति कह सकते हैं, “मैं नहीं जीता हूँ बल्कि ख्रीस्त मुझमें जीते हैं।” (गला.2.19)
प्रणाम मरियमः प्रेम की निशानी
रोजरी विन्ती के दौरान, ईश वचन की घोषणा के बाद हे पिता हमारे और तृत्वमय ईश्वर की महिमा के बीच में प्रणाम मरियम की बरांबारता प्रेम के कार्य को प्रकट करता है। क्या यह यह अथक रुप में “मैं प्रेम करता हूँ” कहना नहीं है? प्रेम का कार्य जिसे हम मरियम के इस तीर्थ स्थल की चित्रकारिता में स्पष्ट रुप से देख सकते हैं, जो हमें येसु की ओर अग्रसर करता और यूख्रारीस्त की ओर लेकर आता है, जो हमारे ख्रीस्त जीवन का स्रोत और चरमसीमा है। संत बारतोलो लोंगो इस बात से अश्वस्त थे जिसे वे अपनी अभिव्यक्ति में कहते हैं, “यूखारीस्त हमारे लिए जीवित रोजरी है, हम उसके सब रहस्यों को पवित्र संस्कार में सक्रिया और मुख्य रुप में पाते हैं।” वे सही थे। यूखारीस्त में, हम ख्रीस्त के जीवन के सभी रहस्यों को पाते हैं, हम उनके बलिदान की याद करते हैं जहाँ वे असल में उपस्थित रहते हैं। रोज़री का रूप-रंग मरियम जैसा है, लेकिन इसके हृदय में ख्रीस्त और यूखारीस्त को हम पाते हैं। यदि हमारी दैनिक प्रार्थना कलीसियाई आराधना है तो रोजरी हमारे जीवन की लय को व्यक्त करती है जो हमें निरंतर येसु और यूखारीस्त की ओर लेकर आती है।
रोजरी सुसमाचार की पूर्णतः
विश्वासियों का समुदाय इस प्रार्थना से सुरक्षित और सुसज्जित होते हैं जो अपने में साधारण और प्रसिद्ध है, वे इसके द्वारा रहस्य की प्रकाष्ठा और ख्रीस्तीय ईशशास्त्र की महत्वपूर्ण समृद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। ख्रीस्त के रहस्य से अधिक महत्वपूर्ण हमारे लिए उसके नाम की घोषणा है जिसे हम कुंवारी मरियम की कोमलता में करते हैं। हमारे लिए उस नाम में, न कि किसी दूसरे नाम में मुक्ति है। (प्रेरि.4.12) हर प्रणाम मरियम की प्रार्थना में हम नाजरेत के घर का अनुभव करते हैं, जहाँ येसु मरियम और योसेफ के संग रहे। हम अंतिम व्यारी की कोठरी का भी अनुभव करते हैं जहाँ मरियम प्रेरितों के संग पवित्र आत्मा के आने की प्रतीक्षा करती हैं। आज का पहला पाठ हमारे लिए इसी बात की चर्चा करता है। हम इस बात का अनुभव कैसे नहीं कर सकते हैं कि स्वर्गोरोहण और पेन्तेकोस्त के मध्य मरियम और प्रेरितगण येसु के जीवन के विभिन्न क्षणों की याद करते हैं। हम किसी व्यख्या की पूर्णतः को नहीं भूल सकते हैं। हर चीज को याद करते, उन्हें जमा करते और उसका अनुसरण करते हैं। इस भांति हम कलीसियाई चिंतन यात्रा की उत्पत्ति को पाते हैं, जिसका सारांश हमारे लिए रोजरी के भेदों में प्राप्त होता है। रोजरी हमारे लिए सुसमाचार की पूर्ण को व्यक्त करती है जिसमें संत पापा जोन पौल द्वितीय ने के भदों को जोड़ते हुए पूर्णतः प्रदान की। हम इस आयाम को संत बारतोलो लोंगो के जीवन में भी सजीव पाते हैं जो तीर्थयात्रियों को इसे सहज ही पूरा करने को नहीं बल्कि उसे धर्मग्रँथ, ख्रीस्त के जीवन पर चिंतन करते हुए पूरा करने का आहृवान करते थे।
दो चुनौतियाँ
संत पापा लियो ने कहा, बहनों और भाइयो, अगर रोज़री को हम "प्रार्थना" की भांति और उससे भी बढ़कर “समारोह” की भांति करते तो यह स्वाभाविक रूप से करूणा का माध्यम बनती है। ईश्वर के करूणा के भाव, पड़ोसी के प्रति करूणाः ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे हैं, जैसा कि संत योहन आज के दूसरे पाठ में हमें इसकी याद दिलाते हैंः "हम बातों या जिह्वा से नहीं, बल्कि काम और सच्चाई से प्रेम करें" (1 यो. 3:18)। इसलिए, संत बारतोलो लोंगो को हम रोज़री और दान के एक प्रेरित स्वरुप पाते हैं। इस मरियम शहर में, उन्होंने अनाथों और कैदियों के बच्चों का स्वागत किया, जिससे प्रेम की नई जान डालने वाली ताकत का पता चलता है। यहाँ, आज भी, तीर्थस्थल के कामों में सबसे छोटे और सबसे कमज़ोर लोगों का स्वागत और उनकी देखभाल की जाती है। रोज़री हमारी निगहों को दुनिया की ज़रूरतों की ओर ले जाती है, जैसा कि प्रेरित पत्र रोज़ेरियुम वर्जिनिस मारिया में ज़ोर दिया गया है, मुख्यतः दो ऐसे उद्देश्य जो आज भी बहुत ज़रूरी हैं: परिवार, जो शादी के रिश्ते के कमज़ोर होने से मुश्किल में है, और शांति, जो अंतरराष्ट्रीय तनाव और ऐसी अर्थव्यवस्था से खतरे में है जो मानव ज़िंदगी की इज्ज़त के बजाय हथियारों के व्यापार को ज़्यादा पसंद करती है।
कुंवारी मरियम का महत्व
संत योहन पौल द्वितीय रोज़री के साल की घोषणा करते हुए पोम्पेई कुंवारी मरियम को एक विशेष महत्व देना चाहते चाहते थे। तब से समय बेहतर नहीं हुआ है। दुनिया के कई इलाकों में अभी भी जो युद्ध लड़े जा रहे हैं, वे न सिर्फ़ आर्थिक और राजनीतिक, बल्कि आध्यात्मिक और धार्मिक तौर पर निष्ठा की मांग करते हैं। शांति हृदय के अंदर पैदा होती है। अक्टूबर 1986 में, संत पापा ने खुद असीसी में मुख्य धर्मों के नेताओं को इकट्ठा किया, और सभी को शांति के लिए प्रार्थना करने का आग्रह किया। हाल के दिनों में कई मौकों पर, संत पापा फ्रांसिस और मैंने दुनिया भर के विश्वासियों से इस मतलब हेतु प्रार्थना करने का निवेदन किया। हर दिन हमें जो मृत्यु की खबरें मिलती हैं, उनसे हम निराश नहीं हो सकते हैं। इस तीर्थ से, जिसके अग्र भाग को संत बारतोलो लोंगो ने शांति के स्मारक स्वरुप सोचा था, आज हम विश्वास के साथ प्रार्थना करते हैं। येसु हमें विश्वास के साथ प्रार्थना करने को कहते हैं क्योंकि विश्वास में की गई प्रार्थना से सब कुछ मिल सकता है (मत्ती 21:22)। और संत बारतोलो लोंगो, मरियम के विश्वास पर चिंतन करते हुए, उन्हें "कृपा में शक्तिशाली” कहते हैं। उनकी दुआ से, शांति के ईश्वर दया की बाढ़ लाएँ, हृदयों को स्पर्श करें, भाईचारे में बिखराव और नफ़रत को शांत करें, तथा सरकार में विशेष ज़िम्मेदारियों वाले लोगों को ज्योति प्रदान करें।
येसु का दिव्य प्रेम
संत पापा ने कहा कि भाइयो और बहनों, दुनिया को कोई भी दुनियावी ताकत नहीं बचा सकती है, सिर्फ़ प्रेम की दिव्य ताकत के, जिसे प्रभु येसु ने हमें दिखाया और दिया है। आइए हम उन पर विश्वास करें, उनसे उम्मीद रखें, आइए हम उनका अनुसरण करें।
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