संत पापा लियोः हम येसु की खोज क्यों करते हैंॽ
वाटिकन सिटी
संत पापा ने अफ्रीका की अपने प्रेरितिक यात्रा के आठवें दिन अंगोला में पवित्र मिस्मा बलिदान अर्पित किया।
संत पापा ने अपने प्रवचन में कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, दुनिया के हर भाग में, कलीसिया ईश प्रजा के रूप में ख्रीस्त के शिष्यों स्वरुप चलती है, जो मुक्तिदाता और भाई हैं। वे, पुनर्जीवित, हमें पिता के पास जाने हेतु मार्ग प्रज्वलित करते और पवित्र आत्मा की शक्ति से हमें पवित्र करते हैं जिससे हम अपने जीवन को उनके प्रेम के अनुरूप परिवर्तित कर सकें। यह हमारे लिए सुसमाचार है, जो हमारी नसों में खून की भांति दौड़ता है, जो हमारे जीवन यात्रा को पोषित करता है। एक यात्रा जो मुझे आज यहाँ आप सभों के बीच लेकर आती है। आनंद और खुशी के इस मिलन में, जहाँ हम येसु के नाम से जमा होते हैं, आइए हम खुले हृदय से मुक्ति के वचनों को सुनें क्योंकि यह उनका अनुसरण करने में हमारी लक्ष्य और उद्देश्य को प्रकट करता है।
हम येसु को क्यों खोजते हैंॽ
वास्तव में, जब ईश्वर का पुत्र मानव बना, तो वे आश्चर्यचकित करने वाले चमत्कारों को करते हैं जिससे वे हमारे लिए पिता की इच्छा को प्रकट कर सकें- उन्होंने अंधों को दृष्टि दान देते हुए अंधेरे में ज्योति प्रज्वलित किया, दबे हुओं को आवाज प्रदान करते हुए गूंगों के जिह्वा खोले, उन्होंने रोटियों में वृद्धि लाते हुए गरीबों और कमजोरों में न्याय की प्यास बुझाई। कोई भी जिसने इन कार्यों की चर्चा सुनी येसु की खोज हेतु निकल पड़ा। वहीं, येसु हमारे हृदयों में झांक कर देखते और पूछते हैं कि क्या हम उन्हें कृतज्ञता में खोजते या सिर्फ अपने स्वार्थ, तोलमोल या प्रेम में ढ़ूढ़ते हैं। वास्तव में, वे अपने पीछे आने वालों से कहते हैं, “तुम मुझे ढ़ूढ़ते हो इसलिए नहीं क्योंकि तुमने चमत्कारों को देखा है लेकिन इसलिए क्योंकि तुम रोटी खा कर तृप्त हो गये हो।” (यो.6.26) वे शब्द हमारे लिए उन लोगों की योजना को प्रकट करते हैं जो एक व्यक्ति से मिलन की चाह नहीं बल्कि भौतिक चीजों की चाह रखते हैं। भीड़ येसु को एक लक्ष्य की प्राप्ति में एक साधन स्वरूप देखती है, एक सेवा देने वाले के रुप में। यदि वे उन्हें खाने को कुछ नहीं दिये होते तो उनकी शिक्षा और उनके कार्य में उनकी कोई रूचि नहीं होती।
हमारी चाह- पाक या नपाक
संत पापा ने कहा कि यह तब होता है जब सच्चे विश्वास की जगह को असत्यधर्मी क्रियाकलाप ले लेते हैं, जहाँ ईश्वर को हम एक देवमूर्ति बना देते और उसकी खोज सिर्फ अपने लाभ के लिए करते हैं। यहाँ तक कि अति सुंदर दान जो हमारे लिए ईश्वर की ओर से लोगों की सेवा हेतु होता है सिर्फ एक बहाना, एक तोल-मोल की चीज या दाम की वस्तु बनकर रह जाती है जो मिले हुए व्यक्तियों द्वारा गलत रूप में परिभाषित किया जाता है। सुमसाचार का दृश्य हमें यह समझने में मदद करता है कि ख्रीस्त को ढूंढने के पीछे गलत इरादे हैं, खासकर जब उन्हें एक गुरु या अच्छे भाग्य स्वरुप देखा जाता है। भीड़ का उद्देश्य भी अपने में पार्यप्त नहीं है: वे एक ऐसे शिक्षक को नहीं ढूंढ रहे थे जिसे वे प्रेम करते हों, बल्कि वे अपने फायदे के लिए एक नेता को ढूंढ रहे थे।
येसु के मनोभाव
येसु का मनोभाव हमारे लिए कितना अलग है। फिर भी, वे इस झूठी खोज का तिरस्कार नहीं करते हैं अपितु उसमें परिवर्तन हेतु प्रोत्साहन देते हैं। वे भीड़ को अपने से दूर नहीं करते हैं, लेकिन हरएक को इस बात की परख करने हेतु निमंत्रण देते हैं कि वे हमारे हृदयों को क्या उत्प्रेरित करता है। येसु ख्रीस्त हमें स्वतंत्रता हेतु निमंत्रण देते हैं- वे सेवकों या ग्रहकों की चाह नहीं रखते हैं, बल्कि वे भाई-बहनों की खोज करते हैं जिनके लिए वे अपने को पूरी तरह से समर्पित कर सकें। विश्वास में इस प्रेम का प्रत्युत्तर देना, हमें केवल येसु को सुनना काफी नहीं है, बल्कि हमें उनके शब्दों के अर्थ को समझने की जरुरत है। यह सिर्फ येसु के कार्यों को देखना नहीं है बल्कि उसका अनुसरण और उन्हें अपने जीवन में कार्यान्वित करना है। जब हम रोटी के वितरण में ईश्वर की योजना को देखते हैं, जो स्वयं को हमारे लिए देते है, सिर्फ तब हम येसु के निकट एक सच्चे अर्थ में आते हैं, जो हमारे लिए शिष्यत्व, प्ररिताई और सेवा बनती है।
अनंत भोजन की खोज करें
संत पापा लियो ने कहा कि इस भांति सीधे तौर पर लोगों को येसु की फटकार एक निमंत्रण है, “उस भोजन के लिए कार्य मत करो जो नष्ट होता है, बल्कि उसके लिए जो अनंत जीवन तक बना रहता हूँ।(यो.6.27)। इन शब्दों के द्वारा वे अपने को हमारे लिए असल उपहार स्वरुप व्यक्त करते हैं। वे हमें अपने दैनिक जीवन की रोटी के लिए उत्सुक रहने को नहीं कहते हैं जिसकी बढ़ोत्तरी वे करते और उसे हमें पिता से अपनी प्रार्थना में माँगने की शिक्षा देते हैं। इसके विपरीत वे हमें सही रूप में जीवन की रोटी, भोजन की खोज करने की शिक्षा देते हैं जो हमें सदैव पोषित करता है। भीड़ में हम एक बड़े और आश्चर्य प्रत्युत्तर को पाते हैं, येसु हमें नष्ट होने वाला भोजन प्रदान नहीं करते हैं बल्कि वह रोटी जो बनी रहती है क्योंकि वह अनंत जीवन का भोजन है।
पुनर्जीवित का सुसमाचार
संत पापा ने कहा कि उनका उपहार हमारे वर्तमान स्थिति को प्रकाशित करता है। आज हम कितने ही लोगों की आशा को हिंसा, शक्तिशालियों के द्वारा शोषण और धनियों के द्वारा घोखा के कारण हतोत्साहित पाते हैं। इसके परिणाम स्वरुप जब अन्याय हृदय को भ्रष्ट करता है, तो रोटी कुछेक लोगों की संपत्ति बन जाती है। इन बुराइयों की उपस्थिति में, ख्रीस्त लोगों की पुकार को सुनते और हमें अपने सारे गिर हुए स्थितियों से उठाते, सभी दुःखों में सांत्वना प्रदान करते हुए अपनी प्रेरिताई में प्रोत्साहित करते हैं। यूखारीस्त जो हमारे लिए जीवन की रोटी है जिसे वे हमें देना कभी बंद नहीं करते हैं, उनका इतिहास हमारे लिए अनंत है। यही कारण है, पुनर्जीवित येसु पवित्र आत्मा की शक्ति से हमारे जीवन को खोलते और हमारे इतिहास, मृत्यु का अंत करते हैं। ख्रीस्त जीवित हैं, वे हमारे मुक्तिदाता हैं। यह सुसमाचार है जिसे हम पृथ्वी के सारे लोगों के संग साझा करते हैं। यह घोषणा हमारे पाप को क्षमा में बदल देती है। यह वह विश्वास है जो हमारे जीवन को बचाता है।
हम विश्वास करें
संत पापा ने कहा कि पास्का का साक्ष्य इस भांति निश्चित रुप में येसु से संबंधित है, क्रूस और पुनर्जीवित से, इतना ही नहीं यह हमें भी अपने में सम्माहित करता है क्योंकि उनमें पुनरूत्थान की हमारी घोषणा ध्वनित होती है। हम दुनिया में मरने हेतु नहीं आये हैं। हम दासता हेतु जन्म नहीं लिये हैं न तो शारीरिक रुप में और न ही आत्म में- हर शोषण, हिंसा, दुराचार और बेईमानी ख्रीस्त के पुनरूत्थान को नकारती है, जो हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ स्वतंत्रता है। यह मृत्यु से स्वतंत्रता, वास्तव में, हमारे लिए दिन के अंत में केवल नहीं बल्कि रोज दिन होता है। इस उपहार का स्वागत करने के लिए हमें क्या करना चाहिएॽ सुसमाचार हमें इसकी शिक्षा देता है,“यह ईश्वर का कार्य है, कि तुम उसमें विश्वास करो जिस उसे भेजा है।” हाँ, हम सभी विश्वास करें। आज हम सभी मिलकर पूरी शक्ति और कृतज्ञता के भाव से यह घोषित करें। “प्रभु येसु, हम अपने पड़ोसियों में तेरा अनुसरण और सेवा करना चाहते हैं, तेरे शब्द हमारे जीवन के नियम हैं, सत्य का मापदंड।”
ईश वचन का प्रभाव
“धन्य हैं वे जो ईश्वर की संहिता में चलते हैं।” (स्तो. 119.118.1) हमने इस भजन को गाया। प्रिय मित्रों, यह ईश्वर हैं जो हमारे लिए इस सफ़र का मार्ग तैयार करते हैं, न कि हमारी ज़रूरतें, न ही आधुनिक फैशन। इसी वजह से, हमारे शिष्यत्व के प्रकाश में कलीसिया का सफ़र एक “पुनरुत्थान और उम्मीद की धर्मसभा” है, जिसे संत योहन पौलुस द्वितीय ने अफ्रीका, अपने प्रेरितिक यात्रा के उपदेश (एक्लेसिया इन अफ्रीका, 13) में घोषित किया था। आइए हम इस विवेक में आगे बढ़ें। संत पापा ने कहा, “सुसमाचार को हृदय में वहन करने से, आपको मुश्किलों और निराशाओं का सामना करने की हिम्मत मिलेगी: ईश्वर ने जिस मार्ग को हमारे लिए खोला है, वह कभी असफल नहीं होता है।” वास्तव में, ईश्वर हमेशा हमारे साथ चलते हैं, ताकि हम उनके मार्ग में सदैव चलते रहें। ख्रीस्त स्वयं हमारी यात्रा को निर्देशित और मज़बूत करते हैं, एक ऐसी यात्रा जिसे हम अधिक से अधिक वैसे जीना सीखना चाहते हैं जैसा कि उसे होना चाहिए, अर्थात धर्मसभा के अनुरूप।
यूखारीस्तः जीवन साझा करना है
इस संदर्भ में, संत पापा लियो ने कहा, “कलीसिया ख्रीस्त के सुसमाचार की घोषणा केवल शब्दों में नहीं करती जो उसे येसु ख्रीस्त से मिला है बल्कि अपने विश्वास, आशा और प्रेमपूर्ण जीवन के साक्ष्य द्वारा जो उनमें निवास करते हैं और इसके लिए हम ख्रीस्त के शिष्यों का धन्यवाद करते हैं।” यूखारीस्त को साझा करना, जो अनंत जीवन की रोटी है, हम अपने लोगों की सेवा निष्ठा में करने हेतु बुलाये जाते हैं, जो उन लोगों को उठना है जो गिरे हैं, उनका पुनः निर्माण करना जो हिंसा के द्वारा नष्ट किये जाते हैं, यह लोगों में खुशी और भातृत्व के भाव को साझा करना है। हमारे पहलों द्वारा दिव्य कृपा विशेषकर विपरीत स्थिति में भी फल उत्पन्न करती है जैसे कि हम प्रथम शहीद संत स्टीफन के जीवन में पाते हैं।
ईश्वर का तोहफा हमारी बुलाहट
प्रिय मित्रों, शहीदों और संतों का साक्ष्य हमें प्रोत्साहित करता और आशा के मार्ग में बढ़ने को उत्प्रेरित करता है, मेल-मिलाप और शांति ईश्वर के उपहार के संग हम लिए समाज में, ख्रीस्तीय समुदाय में उत्तरदायित्व बनते हैं। सुसमाचार के प्रकाश में एक साथ चलना अंगोला की कलीसिया में आध्यात्मिक फल उत्पन्न करता है जो ख्रीस्तायाग से शुरू होता है और हर व्यक्ति और सभी लोगों की पूरी देखभाल में जारी रहता है। खास तौर पर, “जीवंत बुलाहटों का अनुभव जिसे आप करते हैं, इस बात का संकेत है कि आप प्रभु के तोहफे का उत्तर दे रहे हैं, जो हमेशा उन लोगों के लिए भरपूर होता है जो इसे सच्चे दिल से स्वीकार करते हैं।” जीवन की रोटी के लिए धन्यवाद, जिसे हम आज साझा करते हैं, हम इसे पूरे कलीसिया की यात्रा में जारी रख सकते हैं, जिसका लक्ष्य ईश्वर का राज्य है, इसकी ज्योति विश्वास है और इसका जीवन-रक्त करूणा।
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