संत पापा लियोः हम ईश्वर को सुनें और उनका साक्ष्य दें
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो ने कैमरून की प्रेरितिक यात्रा के दौरान बामेंदा अतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे में मिस्सा बलिदान अर्पित करते हुए अपने प्रवचन में साहसपूर्वक ईश्वर को सुनने और उनका साक्ष्य देने का आहृवान किया।
संत पापा ने अपने प्रवचन में कहा कि शांति और एकता के एक तीर्थयात्री स्वरूप आपके प्रांत में आना, आप के संघषों और आशाओं में यात्रा करना मुझे खुशी प्रदान करती है।
आपके समारोही त्योहार जिसका अनुपालन धर्मविधियों में भी होता है और आपकी प्रार्थनाएं जिनके द्वारा जो खुशी प्रवाहित होती है, ईश्वर में आपके अविचलित आशा और पूरी शक्ति से ईश्वर के प्रेम में जुड़ा रहना, जो करूणा में अपनी संतानों के दुःखों की ओर निहारते हैं, विश्वास में भरे पूर्ण समर्पण की निशानियों को व्यक्त करता है। स्त्रोत जिसे हमने विश्वास में गाया, जिसे आज हम अपने जीवन में नवीन करने के लिए बुलाये जाते हैं, “प्रभु दुःखियों से दूर नहीं है, जिनका मन टूट गया, प्रभु उन्हें सँभालता है। (स्त्रो34:18)।
हमारे जीवन की परिस्थितियाँ
संत पापा लियो ने कहा कि जीवन में बहुत सारी परिस्थितियाँ ऐसी हैं जो हमारे हृदयों को तोड़ देती और हमें दुःख में धेकेल देती है। भविष्य में शांति और मेल-मिलाप की हमारी आशा, जहाँ हम हर मानव के सम्मान और मौलिक अधिकारों को पाते हैं, निरंतर इस सुन्दर देश में बहुत सारी समस्याओं के कारण निराशा का कारण बनती हैं। इसमें हम गरीबी के असंख्य रूपों को देखते हैं जो अब भी बहुत से लोगों को भोजन की कमी के रुप में प्रभावित करती है। हम इसमें नौतिक, सामाजिक और राजनीतिक भष्टचार को पाते हैं। उससे भी अधिक हम धन के प्रंबंधन को देखते हैं, जो संस्थानओं और संरचानाओं के विकास में बाधा डालती है। हम शिक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालने वाली गंभीर समस्याओं के अलावे बड़े पैमाने पर दूसरे देशों में प्रवासन, खासकर युवाओं के प्रवासन को भी देखते हैं। इन अंदरूनी समस्याओं के अलावे, जो अक्सर नफ़रत और हिंसा को बढ़ती है, हम बाहर से होने वाले नुकसान को भी पाते हैं, जो उन लोगों द्वारा किया जाता है, जो मुनाफ़े के नाम पर, अफ़्रीकी महाद्वीप का शोषण और लूटपाट करने के लिए उस पर हाथ रखते हैं।
आज, परिवर्तन का समय
संत पापा ने कहा कि ये सारी चीजें हमें शक्तिहीन करती और हमारे विश्वास को कम कर देती हैं। यद्यपि यह परिवर्तन का समय है, इस देश की कहानी के बदलने का। समय आ गया है, यह कल नहीं बल्कि आज है, अभी न की भविष्य में, जहाँ देश और महाद्वीप की विविधता और समृद्धि को एक साथ लाते हुए हमें एकता की नींव को फिर स्थापित करने की जरुरत है। इस भांति हम एक ऐसे समाज का निर्माण करने में सक्षम होंगे जहाँ शांति और मेल-मिलाप कायम रहती है।
ईश वचन शक्तिशाली
उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि एक ही स्थिति कुछ समय के लिए बनी रहती तो हम उसे छोड़ने और उसमें परिवर्तन लाने हेतु निःसहाय अनुभव करते हैं, क्योंकि हम कुछ नया होने की आशा नहीं करते हैं। इसके बावजूद ईश्वर का वचन हमारे लिए नई संभावनाओं को खोलते और हमारे लिए परिवर्तन तथा चंगाई लाता है। उसमें हमारे हृदयों को हिलाने की क्षमता है, हम सामान्य जीवन की घटनाओं में चुनौती प्राप्त करते हैं जिनके हम आदी हो गये हैं, यह हमें बदलाव लाने का साधन होने में मदद करता है। हमें यह याद रखें- ईश्वर नवीन हैं, वे नई चीजें बनाते हैं, ईश्वर हमें साहसपूर्ण व्यक्ति बनाते हैं जिससे हम बुराई का सामना करके अच्छाई का निर्माण करें।
प्रेरितों का साक्ष्य
संत पापा ने कहा कि हम इसे प्रेरितों के साक्ष्य में पाते हैं जिसे हमने प्रथम पाठ में सुना। महासभा के अधिकारियों द्वारा पूछताछ किये जाने, धमकी और गाली मिलने पर, क्योंकि उन्हें खुले रूप में ख्रीस्त को घोषित किया, वे उत्तर में कहते हैं,“मनुष्यों की अपेक्षा ईश्वर की आज्ञा का पालन करना कहीं अधिक उचित है। आप लोगों ने ईसा को क्रूस के काठ पर ल़टका कर मार डाला था, किन्तु हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने उन्हें पुनर्जीवित किया। (प्रेरि. 5.29-30)
अंतरात्मा की आवाज सुनें
प्रेरितों का साहस हमारे लिए अंतरात्मा की आवाज बनती है, एक घोषणा, जो बुराई का परित्याग करती है और यह परिवर्तन की ओर पहला कदम है। वास्तव में, ईश्वर की आज्ञा मानना अपने को समर्पित करना नहीं है जो हमें दबाता है या हमारी आज़ादी को खत्म करता हो; इसके विपरीत, ईश्वर की आज्ञा मानना हमें स्वतंत्र करता है, क्योंकि इसका अर्थ अपनी ज़िंदगी उन्हें सौंपना और उनके वचन को अपनी सोच और काम करने के तरीके में प्रेरित होना है। इस तरह, जैसा कि हमने सुसमाचार में सुना, जो येसु और निकोदेमुस के बीच वार्ता का अंतिम भाग है, “जो ऊपर से आता है, वह सर्वोपरि है। जो पृथ्वी से आता है वह पृथ्वी का है और पृथ्वी की बातें बोलता है जो स्वर्ग से आता है वह सर्वोपरि है। (यो. 3:31)। जो लोग इंसानों और दुनियावी सोच के बजाय ईश्वर की आज्ञा मानते हैं, वे अंदर से अपने को स्वतंत्र पाते हैं, वे अच्छाई की कीमत जानते हैं और बुराई को नहीं मानते हैं। वे ज़िंदगी में अपना नया रास्ता ढूंढते हैं और शांति और भातृत्व के निर्माता होते हैं।
ईश्वर के वचन में बने रहें
भाइयो और बहनों, संत पापा लियो ने कहा कि टूटे हुए दिलों को दिलासा और समाज में परिवर्तन केवल तब संभव है जब हम खुद को ईश्वर और उनके वचन पर छोड़ देते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने हृदय में पेत्रुस के संबोधन को स्थान दें, उसे याद रखें- “ईश्वर की आज्ञा मानो, इंसानों की नहीं। उनकी आज्ञा मानो, क्योंकि सिर्फ़ वही ईश्वर हैं।” यह हमें सुसमाचार को अपनी संस्कृति में सम्माहित करने को कहता है। यह हमें अपने धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर भी सावधान रहने को कहता है, जिससे काथलिक धर्म दूसरे रहस्यमयी या अविश्वास सोच वाली मान्यताओं और परंपराओं के जाल में न फँसें, जो वास्तव में राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्य पूरा करते हैं। सिर्फ़ ईश्वर ही हमें आज़ाद करते हैं; सिर्फ़ उनका वचन ही स्वतंत्रता का मार्ग खोलता है; सिर्फ़ उनकी आत्मा ही हमें इस देश को बदलने के काबिल हममें नवीनता लाती है।
संत पापा का आशीर्वाद
अपने प्रवचन के अंत में संत पापा लियो ने कहा कि मैं निंरतर अपनी प्रार्थना में आपके साथ हूँ और मैं विशेष रुप से इस एकत्रित कलीसिया को आशीर्वाद देता हूँ: कई पुरोहित, प्रेरित, धर्मसंघी और लोकधर्मी जो सांत्वना और आशा का स्रोत बनने की कामना हेतु कार्य करते हैं। मैं आपको इस मार्ग में चलते रहने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ, और मैं आपको पवित्र मरियम, प्रेरितों की रानी और कलीसिया की माँ की मध्यस्थता में सुपूर्द करता हूँ।
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