संत पापाः जीवन की कहानियाँ सुसमाचार में प्रकाशित होती हैं
वाटिकन सिटी
पापा लियो 14वें अफ्रीकी देशों की अपनी प्रेरितिक यात्रा के अंतिम पड़ाव 11वें दिन इक्वेटोरियल गिनी के मालाबो स्टेडियम में यूखारीस्तीय बलिदान अर्पित किया।
संत पापा ने अपने प्रवचन कहा कि सुसमाचार जिसे हमने अभी सुना है हमें इस बात की चुनौती प्रदान करता है कि क्या हम आज के पढ़े गये सुसमाचार पदों का सही अर्थ में अनुवाद करना जानते हैं। यह सवाल हमारे लिए गम्भीर और महत्वूपर्ण दोनों है क्योंकि यह हमें इतिहास की पुस्तक को एक साथ पढ़ने हेतु तैयार करता है, अर्थात हमारे जीवन के पन्नों को जिसे ईश्वर हमें अपनी प्रज्ञा से पढ़ने हेतु सदैव प्रेरित करते हैं।
दूसरे से मदद
संत पापा ने कहा कि जब उपयाजक फिलिप येरूसालेम से अफ्रीका लौटते हुए एक यात्री के निकट आते और उसे पूछते हैं, “आप जो पढ़ रहे हैं क्या उसे समझते हैंॽ” यात्री, जो इथोपिया की रानी का एक खोजा था, अपने विवेकपूर्ण नम्रता में तुरंत उत्तर देता है,“यदि कोई मुझे इसके बारे में व्याख्या न करें तो मैं कैसे समझ सकता हूँ।” उसका सवाल केवल सत्य की खोज के संबंध में नहीं है, लेकिन हम उसमें एक खुलेपन और चाह को पाते हैं। आइए हम उस व्यक्ति पर चिंतन करें, संत पापा ने कहा- वह व्यक्ति अपनी धरती की तरह ही धनी है, यद्यपि वह एक गुलाम है। धन जिसका वह प्रबंधन करता है वह स्वयं उसका नहीं है, यह उसकी मेहनत है जिसके कारण दूसरे लाभांवित होते हैं। वह अपने में कुशाग्र बुद्धि और सज्जन व्यक्ति है जैसा कि उसके कार्य और प्रार्थना में, हमारे लिए व्यक्त किया गया है लेकिन वह अपने में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। यह दुःखद सच्चाई उसके शरीर में भी व्यक्त होती है, वह वास्तव में, एक खोजा है। वह जीवन नहीं ला सकता है, उसकी सारी ताकत एक ऐसी सेवा में लगी रहती है जो उसे नियंत्रित और उस पर राज करती है।
ईश वचन का प्रभाव
यद्यपि, अफ्रीका अपनी मातृभूमि लौटते समय जो उसके लिए दासता का एक स्थल है, सुसमाचार की घोषणा उसे मुक्ति प्रदान करती है। ईश वचन जिसे वह अपने हाथों में वहन करता है उसके लिए आश्चर्यजनक रुप में फल उत्पन्न करता है। उपयाजक फिलिप से मिलन, जो क्रूसित और पुनर्जीवित येसु का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, खोजा के जीवन को एक मूकदर्शक से एक नायक के रुप में परिवर्तित कर देता है, क्योंकि वह अपने को व्यक्तिगत रुप में प्रभावित होता पाता है। पवित्र धर्मग्रंथ उसे संबोधित करता है और उसके अंदर एक सत्य की चाह हेतु हलचल उत्पन्न करता है। वह अफ्रीकी व्यक्ति सुसमाचार में प्रवेश करता है, जो हर व्यक्ति को निमंत्रण देता है जो ईश वचन को पढ़ते और उसे समझे की चाह रखते हैं। वह मुक्ति इतिहास में प्रवेश करता है जो हर नर और नारी का आलिंगन करती है, विशेषकर जो प्रताड़ित हैं, जो परित्यक्त और हमारे बीच में सबसे छोटे हैं। लिखित वचन इस भांति एक जीवित सच्चाई बनते हैं- बपतिस्मा के द्वारा, वह अपने में एक अपरिचित नहीं रह जाता बल्कि ईश्वर की एक संतान बनता है, विश्वास में हम सभों के लिए एक भाई। जो भी कि वह गुलाम और संतानहीन है, येसु के नाम में उसके एक नया और स्वतंत्र जीवन प्राप्त होता है। और आज हम उनमें उसी मुक्ति की बात घोषित करते हैं जब हम सुसमाचार का विशेष अध्ययन करते हैं।
बपतिस्मा का बुलाहट
उसकी तरह ही हम भी अपने बपतिस्मा में ख्रीस्तीय बने हैं, हमने उसी ज्योति को प्राप्त किया है, अर्थात उसी विश्वास को जिसके द्वारा हम ईश वचनों का पठन-पाठन करते हैं- हम भविष्यवाणियों पर चिंतन करते, स्त्रोत के माध्यम प्रार्थना करें, संहिता का अध्ययन करते और अपने जीवन के द्वारा सुसमाचार की घोषणा करते हैं। सुसमाचार के सारे पद, वास्तव में, विश्वास में हमारे लिए उस सच्चे अर्थ को व्यक्त है क्योंकि वे विश्वास में लिखे और हमें दिये गये हैं। अतः उनका अध्ययन करना हमारे लिए सदैव व्यक्तिगत और कलीसियाई कार्य होता है, यह अपने में अकेला कभी नहीं होता या न ही सिर्फ यांत्रिक होता है।
धर्मग्रँथ की समझ, दूसरों की सहायता जरूरी
संत पापा लियो ने कहा कि हम धर्मग्रंथ का अध्ययन कलीसिया को मिली एक निधि स्वरुप करते हैं, जहाँ पवित्र आत्मा हमें दिशा-निर्देशित करते, जो उसके संरचना और प्रेरितिक परंपरा के संबंध में हमें प्रेरित करता है जिसके माध्यम से इसे सुरक्षित और सारी दुनिया में प्रसारित किया गया है। उस खोजा की भांति, हम भी ईश्वर के वचन को उनकी सहायता द्वारा समझने के योग्य होते हैं जो हमारे मार्ग दर्शक स्वरुप हमारे संग विश्वास की यात्रा करते हैं। उपयाजक फिलिप की स्थिति वैसी ही थी, “वह उसके संग बातें करने लगा, और सुसमाचार के पदों से शुरू करते हुए, येसु के बारे में सुसमाचार की घोषणा की।” वह अफ्रीकी यात्री एक भविष्यवाणी को पढ़ रहा था जो उसके लिए पूरी हुई, जैसे कि यह आज हमारे लिए पूरी होती है। नबी इसायस दुःख से पीड़ित सेवा, येसु, उनके दुःखभोग, मृत्यु और पुनरूत्थान की चर्चा करते हैं (इसा.53.7-8), जो हमें पाप औऱ मृत्यु से बचाता है। वे शरीरधारी शब्द हैं, जिसमें ईश्वर के हर शब्द अपनी पूर्णतः को प्राप्त करती है, वे उसकी वास्ताविकता को प्रकट करते हैं, पूरे अर्थ और उसके अंतिम लक्ष्य को।
येसु जीवंत रोटी - अनंत जीवन
संत पापा लियो ने कहा कि येसु जैसे कि हमें स्वयं कहते हैं, “किसी ने पिता को नहीं देखा है, सिवाय उसके जो ईश्वर से आता है।” (यो.6.46) पुत्र में, पिता स्वयं अपनी महिमा को प्रकट करते हैं, ईश्वर स्वयं अपने को प्रस्तुत करते हैं जिन्हें हम सुनते और स्पर्श करते हैं। येसु कार्य द्वारा, जो मुक्तिदाता हैं, जीवन प्रदान करते हुए सारी चीजों को पूर्णतः प्रदान करते हैं। वे दुनिया की सृष्टि करते उसे बचाते और उसे सदैव प्रेम करते हैं। येसु अपने सुनने वालों को एक चिन्ह द्वारा इसकी याद दिलाताते हैं, “तुम्हारे पूर्वजों में मरूभूमि में मन्ना खाया।” वे निर्गमन के अनुभव की याद दिलाते हैं- गुलामी से स्वतंत्रत की ओर एक यात्रा, यद्यपि यह भटकने का, एक कठिन चालीस साल का समय बन गया। यह देर इसलिए होती है क्योंकि लोगों ने ईश्वर की प्रतिज्ञा पर विश्वास नहीं किया, यहाँ तक कि वे मिस्र देश वापस लौटने की तमन्ना रखे। वास्तव में, फाराऊन के राज्य में उन्हें भूमि की ऊपज खाने को मिली, यद्यपि ईश्वर उन्हें मरूभूमि में ले जाते हैं, जहाँ रोटी सिर्फ उनकी कृपा से प्राप्त होती थी। मन्ना इस भांति एक चिन्ह है, एक आशीष और एक प्रतिज्ञा जिसे पूरा करने हेतु येसु आते हैं। यह प्राचीन निशानी अब नये और अनंत संस्कार – यूखारीस्त- की निशानी बनती है, वह रोटी जिसे स्वर्ग से उतरने वाले ने पवित्र कर, हमारे पोषण हेतु प्रदान किय़ा। “यदि वे जिन्होंने मन्ना खाया मर गये, जो यह रोटी खाते हैं वे अनंत काल तक जीवित रहेंगे, क्योंकि ख्रीस्त जीवित है। वे पुनर्जीवित हैं और वे निरंतर हम सबों को जीवन प्रदान करते हैं।”
पास्का में गुलामी से मुक्ति
येसु के पास्का द्वारा, जो निश्चित निर्गमन है, हर मानव को बुराई की गुलामी से आज़ाद मिलती है। जब हम इस मुक्तिदायी रहस्य का आनंद मनाते हैं, प्रभु हमें एक निश्चित निर्णय लेने को कहते हैं: “जो कोई विश्वास करता है, उसे अनंत जीवन प्राप्त है।” ( 47)। येसु में, हमें एक हैरान करने वाली उम्मीद दी जाती है- ईश्वर अपने को स्वयं हमारे लिए देते हैं। क्या मैं इस बात पर भरोसा करता हूँ कि उनका प्रेम मेरी मौत से ज़्यादा मज़बूत हैॽ उन पर विश्वास करने का चुनाव करते हुए, हम अपरिहार्य निराशा के मध्य आशा का चुनाव करते हैं, जिसे ईश्वर हमें प्रदान करते हैं। ज़िंदगी और न्याय के लिए हमारी भूख तब येसु के शब्दों से पूरी होती है: “जो रोटी मैं तुम्हें प्रदान करूंगा वह दुनिया के लिए मेरा मांस है” (51)।
ख्रीस्त हमारे सब कुछ हैं
संत पापा ने कहा, “हे प्रभु हम तेरा धन्यवाद करते हैं, हम तेरी स्तुति करते और तुझे धन्य कहते हैं, क्योंकि तूने हमारे लिए यूखरीस्त बनने का चुनाव किया, अनंत जीवन की रोटी, जिससे हम अनंत काल तक जीवित रह सकें।” प्रिय मित्रों, संत पापा ने कहा कि इस समय जब हम मुक्ति के संस्कार का समारोह मनाते हैं, हम आनंद में यह घोषित कर सकते हैं, “ख्रीस्त हमारे लिए सब कुछ है। हम उनमें अपने जीवन की पूर्णतः और अर्थ को पाते हैं। “यदि कोई अन्याय से पीड़ित है, वे न्याय हैं, यदि तुम्हें सहायता की जरुरत है, तो वे तुम्हारी शक्ति हैं, यदि तुम्हें मृत्यु का भय है, वे जीवन हैं, यदि तुम्हें स्वर्ग की चाह है, वे तुम्हारे मार्ग हैं, यदि तुम अंधकार में हो, तो वे ज्योति हैं।” (संत अगुस्टीन, दे भेरजीनिताते,16.99)। येसु ख्रीस्त की उपस्थिति में हमारी समस्याएँ लुप्त नहीं होती हैं, लेकिन हम उन्हें प्रकाशित हो पाते हैं। जैसे कि हर क्रूस येसु में मुक्ति को प्राप्त करता है, उसी भांति हमारे जीवन की कहानियों का अर्थ हम सुसमाचार में पाते हैं। अतः, हममें से हर कोई आज कह सकता है- “धन्य है ईश्वर, उसने मेरी प्रार्थना नहीं ठुकरायी, उसने मुझे अपने प्रेम से वंचित नहीं किया” (स्तो. 66.20)। वे सर्वप्रथम हमें प्रेम करते हैं। उनका वचन हमारे लिए सुसमाचार है और दुनिया को घोषित करने हेतु हमारे पास उससे बड़ा कुछ नहीं है। अपने बपतिस्मा के समय से, भातृत्वमय एकता में, पाप क्षमा के शुद्धिकारण और आशा के स्रोत में हम सब इसी सुसमाचार की घोषणा करने हेतु बुलाये गये हैं। हमारे साक्ष्य द्वारा, मुक्ति की घोषणा में- हमारे कार्य, सेवा और क्षमा में प्रत्यक्ष होती है- एक शब्द में, हम कलीसिया का निर्माण करते हैं।
हमारी उदासी और निराशा
संत पापा फ्रांसिस के प्रेरितिक प्रबोधन सुसमाचार की खुशी को उदृधृत करते हुए संत पापा लियो ने कहा, “सुसमाचार की खुशी उन सबों के हृदयों और जीवन को भर देती है जिनका मिलन येसु से होता है।” वहीं, जब हम इस खुशी को साझा करते हैं, हम अपने को इस जोखिम के प्रति भी अधिक सचेत होता पाते हैं, “एक आत्मसंतुष्ट परन्तु लालची हृदय, तुच्छ सुखों की तीव्र खोज करता, और कुंद विवेक, उदासी और पीड़ा उत्पन्न करता है। जब हमारा आंतरिक जीवन स्वयं की चाहतों और चिंताओं में पड़ जाता, तो इसमें दूसरों के लिए, गरीबों के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता है। हम ईश्वर की आवाज को नहीं सुन पाते हैं, हम उनके शांतिमय प्रेम की खुशी का अनुभव नहीं करते हैं।” इस संकीर्ण मनोभावओं की उपस्थिति में यह ईश्वर का प्रेम है जो विशेष कर न्याय और एकता की सेवा में, हमारे प्रयासों को पोषित करता है।
संत पापा लियो ने अपने प्रवचन के अंत में कहा कि इसी कारण, मैं आप सभों को प्रोत्साहित करता हूँ, इक्वेटोरियल गिनी की सजीव कलीसिया के रुप में, आप येसु ख्रीस्त के प्रथम शिष्यों की भांति उनके प्रेरिताई को आनंद में करें। आप जैसे आज के सुसमाचार का अध्ययन करते हैं, उसकी घोषणा उत्साह में करें जैसे उपयाजक फिलिप ने किया। और जैसे आज आप यूखारीस्तीय बलिदान अर्पित कर रहे हैं, अपने जीवन के द्वारा साक्ष्य दें, उस विश्वास का जो हमें बचाता है, जिससे ईश्वर का वचन सभों के लिए अच्छा खमीर बन सकें।
Thank you for reading our article. You can keep up-to-date by subscribing to our daily newsletter. Just click here
