संत पापा लियोः इक्वेटोरियल गिनी राजनायिकों को अधिकार बोध
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो 14वें ने अफ्रीकी देशों की अपने प्रेरितिक यात्रा के चौथे पड़ाव पर इक्वेटोरियल गिनी की यात्रा करते हुए वहाँ के राष्ट्रपति राजनायिकों से भेंट की और उन्हें अपना संदेश दिया।
संत पापा लियो ने अपने गर्मजोशी स्वागत हेतु अपने कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हुए कहा कि प्रिय गिनीवासियों आप के बीच आना मुझे खुशी प्रदान करती है। संत पापा ने 18 फरवरी 1982 संत पापा जोन पौलुस द्वितीय की प्रेरितिक यात्रा की याद कराया, जिसे उन्होंने देश के संबंध में राष्ट्रपति से कहा था, “एक ऐसा सिंबॉलिक सेंटर जहाँ लोगों की सजीव उम्मीदें सच्ची आजादी, न्याय, सम्मान और हर मानीवय अधिकारों या समुदायों के अधिकारों का माहौल बनाया जा सके, और रहने की बेहतर परिस्थितियाँ हों, जिससे हर कोई अपने में मानव और ईश्वरीय संतान होने की अनुभूति करे।”
संत पापा ने कहा कि ये वे शब्द हैं जो अब भी बने रहते और उन्हें चुनौती प्रदान करते हैं जिन्हें सार्वजनिक जिम्मेदारी सौंपी गई। वहीं दूसरी ओर, हमारे समय के लोगों की खुशी और आशा, दुःख और मुसीबतें विशेषकर वे जो गरीब या पीड़ित हैं, उनके दुःख और आशा, मुसीबतें और तकलीफें हैं जो ख्रीस्त का अनुसरण करते हैं। “कोई भी सच्ची मानवीय चीज़ उनके दिलों में जगह बनाने से नहीं चूकती है।" (गौदियुम एत स्पेस 1) द्वितीय वाटिकन महासभा, प्रेरितिक उद्बोधन गौदियुम एत स्पेस की ये बातें और भावनाएँ सटीक बैठती हैं जो मुझे आपके पास लाती हैं, जिससे मैं आपके विश्वास को पुख्ता कर सकूँ और इस देश के लोगों को सांत्वना दे सकूँ जो तेज़ी से बदल रहे हैं। क्योंकि, जैसे ईश्वर के हृदय में, वैसे ही कलीसिया के हृदय में, वे बातें गूंजती हैं जो लाखों नर और नारियों के मध्य होता है, जिनके लिए ईश्वर ने अपने को कुर्बान कर दिया।
दो शहर
संत पापा लियो ने कहा कि आप जानते हैं कि संत अगुस्टीन ने घटनाओं और इतिहास को दो शहरों के संदर्भ में परिभाषित किया, “ईश्वर का शहर” जो ईश्वर के अनंत शर्तहीन प्रेम साथ ही पड़ोसी प्रेम में निहित है विशेष कर गरीबों में, और “पृथ्वी का शहर” जो हमारे लिए क्षणिक निवास स्थल है, जहाँ नर और नारियाँ मृत्यु तक जीते हैं। इस परिदृश्य में, दोनों शहर समय के अंत तक सह-अस्तित्व में बने रहते हैं और हर मानव, अपने रोज दिन के फ़ैसलों अनुसार, उनमें से किसी एक का अंग बनता है।
किसी शहर की सेवा बेहतर
संत पापा लियो ने कहा कि मैं जानता हूँ कि आप अपने देश हेतु एक नई राजधानी का निर्माण, एक परियोजना की शुरूआत की है। आप ने धर्मग्रंथ के अनुसार उसके लिए एक नाम चुना है जो येरूसालेम की तरह ध्वनित होती है। यह निर्णय हममें से हर किसी को इस बात पर विचार करने हेतु अग्रसर करें कि हम किस शाहर की सेवा करना चाहते हैं। रोम में राजनायिक प्रतिनिधियों से मिलन को दौरान मैंने संत अगुस्टीन का हवाला देते हुए उन्हें यह कहा था कि पृथ्वी का शहर स्वार्थपूर्ण प्रेम पर क्रेन्दित है जहाँ हम शक्ति की भूख और दुनियावी शोहरत को पाते हैं जो हमें विनाश की ओर ले जाती है।
शहारों के निर्माता ईश्वर
संत पापा ने कहा कि संत अगुस्टीन कहते हैं ख्रीस्तीय ईश्वर के द्वारा पृथ्वी रूपी शहर में जीने हेतु बुलाये गये हैं जबिक उन्हें अपने हृदयों और दिमाग को स्वर्गीय शहर की ओर उठाये रखे जाने को कहा जाता है जो उनका सच्चा निवासस्थल है। यह वह शहर है जिसके ओर आब्रहम निकल पड़ा, बिना जाने की वह किधर जा रहा है। अपने विश्वास के कारण वह इस भूमि में रहा जिसकी उसे प्रतिज्ञा की गई थी,एक अनजान भूमि में, तम्बू बना कर, वैसे ही इसाहक और याकूब ने कभी किया, जो उसी प्रतिज्ञा के लिए उसकी संतान थे। वह उस शहर को देखता है जिसका निर्माण और नींव, संरचना स्वयं ईश्वर ने की थी। (ईब्र.11.8-10)। पृथ्वी पर, एक यात्री की भांति हर मानव पुरानी चीजों का लाभ उठा सकता है। यह समझना ज़रूरी है कि क्या बना रहता है और क्या नष्ट हो जाता है, ताकि गलत दौलत और राज के भ्रम से दूर रहा जा सके। विशेष रुप में, “पृथ्वी रूपी शहर में रहने वाले ख्रीस्तीय राजनीति की दुनिया से अपरिचित नहीं हैं, अत धर्मग्रंथ से निर्देशित हम ख्रीस्तीय नैतिकता को नागर समाज में लागू करने की कोशिश करें। ईश्वर के शहर में हम कोई राजनीतिक कार्यक्रम को नहीं पाते हैं। इसके बदले, यह सामाजिक और राजनीतिक ज़िंदगी से जुड़ी बुनियादी मुद्दों पर विचार प्रदान करता है।”
ईश्वरीय राज्य को प्रथामिकता दें
संत पापा लियो ने कहा कि आज, कलीसिया की सामाजिक शिक्षा उन सभी को निर्देश देती है जो उन “नई चीज़ों” को संबोधित करना चाहते हैं जो हमारे पृथ्वी और मानव के सह-अस्तित्व को अस्थिर करती हैं जबकि हमें ईश्वर के राज्य और उनके न्याय को प्रथामिकता देने की आवश्यकता है। यह कलीसिया की प्रेरिताई का एक मूलभूत आयाम है: सुसमाचार की घोषणा के अनुरूप अंतरआत्मा, नौतिकता और सच्ची नौतिक सिद्धांतों का परीशिक्षण जिसके फलस्वरुप हम व्यक्तिगत, देशों और सरकारों की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं। आखिरकार, सामाजिक शिक्षण का उद्देश्य लोगों को लगातार उत्पन्न होने वाली मुसीबतों का सामना करने के लिए तैयार करना है, क्योंकि हर पीढ़ी अद्वितीय है, जो अपने साथ नई चुनौतियाँ, नए सपने और नए सवाल लेकर आती हैं।
अधिकारियों का फर्ज
आज हम उन समस्याओं का सामना करते हैं जो मानवीय अस्तित्व के नींव को हिला कर रख देती हैं। संत पापा ने कहा कि परित्याग आज सामाजिक अन्याय का नया चेहरा बन गया है। हम अल्पसंख्यों और बहुसंख्यकों के मध्य एक बड़ी खाई को पाते हैं। परित्याग के बारे में जिक्र करना हमारे लिए एक विरोधाभाव भी उत्पन्न करता है। भूमि, भोजन, निवास और सम्मानजनक रोजगार का कमी आज की नई तकनीकी विकास के साथ हर जगह वैश्विक बाजारों के साथ फैल गई है। सेल फोन, संचार माध्यम और कृतिम बुद्धिमत्ता लाखों लोगों की झोली में है, जो गरीबों को भी सम्माहित करता है। इसलिए, सामाजिक अधिकारियों और अच्छी राजनीति का यह फ़र्ज़ ज़रूरी बनता है कि वे पूरे मानवनता के विकास में आने वाली रुकावटों को दूर करें।
तकनीकी प्रगति का प्रभाव
उदाहरण के लिए, इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि हम कितनी तेज़ी से तकनीकी में बदलाव देख रहे हैं। यह बदलाव सष्टि की सुरक्षा, स्थानी समुदाय के अधिकार, मज़दूरों का सम्मान और जन सामान्य के स्वास्थ्य की सुरक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर हावी हो रहा है। इस संदर्भ में, संत पापा लियो ने संत पापा फ्रांसिस, जिनकी मृत्यु ठीक एक साल पहले हो गयी, की अपील को दोहराते हुए कहा, “आज हमें बहिष्कार और असमानता की अर्थव्यवस्था को 'तुम ऐसा नहीं करोगे' कहना होगा। ऐसी अर्थव्यवस्था जानलेवा होती है" (प्रेरितिक प्रबोधन, एभेंजेली गौदियुम, 53) असल में, आज यह पिछले सालों की तुलना में और भी ज़्यादा स्पष्ट है कि हथियारों से जुड़ी लड़ाइयों का बढ़ना अक्सर तेल और संसाधनों के दोहन के कारण होता है, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों या लोगों की सुरक्षा की परवाह किए बिना होता है।
तकनीकी का गलत उपयोग
संत पापा लियो ने कहा कि बहुधा ऐसा लगता है कि इन तकनीकी को खास तौर पर युद्ध जैसे मकसदों के लिए बनाया और इस्तेमाल किया जाता है, ऐसे हालात सबों के लिए अवसर उत्पन्न करने में नाकाम होते हैं। इसके विपरीत, मानवीय सम्मान को ध्यान में रखें बिना राजनीतिक ज़िम्मेदारी और संस्थाओं तथा अंतरराष्ट्रीय समझौते, मानवता के किस्मत के संग तोल-मोल करता है। ईश्वर ऐसा नहीं चाहते हैं। उनके पवित्र नाम को उन लोगों द्वारा अपवित्र नहीं किया जाना चाहिए जो शक्तिशाली हैं, मौत के फैसलों और कामों को सही ठहराने के लिए इसका कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। आपका देश विकास के अपने रास्तों और कानून तथा न्याय की सेवा में अंतराष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थापित करने के अच्छे मौकों का मूल्यांकन करने न हिचकिचाए।
युवा देश, नई उर्जा
संत पापा ने कहा कि आपका देश युवा है। इसलिए, मुझे यकीन है कि कलीसिया के अंदर आपको स्वतंत्रता और सचेतना में ज़िम्मेदार बनाने को मदद मिलेगा, जिससे आप भविष्य की ओर एक साथ आगे बढ़ सकेंगे। घमंड से घायल दुनिया में, लोग न्याय के भूखे और प्यासे हैं। उन लोगों को प्रोत्साहित करने की जरुरत है जो शांति में विश्वास करते हैं और “धारा के प्रतिकूल” नीति में शामिल होने का साहस करते हैं – जो आम भलाई को केन्द्र में रखते हैं। हमें जिन चीजों की तुरंत ज़रूरत है, वे हैं नये दृष्टिकोण और एक शिक्षण का प्रभाव जो युवाओं को स्थान और भरोसा देता है। ईश्वर का का शहर – शांति का शहर – सचमुच में हमें ऊपर से एक उपहार की भांति मिला है, वह क्षितिज जिसकी ओर हमारी हर अच्छी ख्वाहिश मुड़ती है। यह एक प्रतिज्ञा और एक उत्तरदायित्व दोनों है। इसके निवासी “अपनी तलवारों को हल के फाल और अपने भालों को हंसिया बना लेंगे” (इसा,2:4)। हर आंसू पोंछने के बाद, वे एक ऐसे भोज में हिस्सा लेंगे जो अब सिर्फ़ अमीर लोगों के लिए नहीं है, क्योंकि मज्जा से भरा स्वादिष्ट भोज और अच्छी अंगूरी (इसा. 25:6) की दावत सबों के बीच बांटी जाएगी।
प्रिय राष्ट्रपति, देवियों और सज्जनों, आइए हम सब मिलकर समझदारी और उम्मीद के साथ ईश्वर के शहर की ओर चलें, जो शांति का शहर है।
Thank you for reading our article. You can keep up-to-date by subscribing to our daily newsletter. Just click here
