पोप लियो : संत जोसेफ और पवित्र परिवार से आतिथ्य सीखें
वाटिकन न्यूज
पोप लियो 14वें ने बृहस्पतिवार को वाटिकन में “कथेड्रा ऑफ हॉस्पिटालिटी” के प्रतिभागियों से बात करते हुए कहा, “मैं आपको आतिथ्य में गुरू बनने के लिए बढ़ावा देता हूँ।” यह एक सांस्कृतिक और शैक्षनिक कार्यक्रम है जो रोम से बाहर सक्रोफानो में हो रहा है।
रोम के परमधर्मपीठीय लातेरन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर आंदोलन और तीसरे विभाग के संगठन द्वारा आयोजित किया गया यह कार्यक्रम, मौजूदा मुद्दों पर बातचीत और सोच-विचार के लिए जगह देता है। इस साल, इसकी विषयवस्तु थीम थी “युवा और कलीसिया: आतिथ्य जो अपनेपन को बढ़ावा देती है।”
अपने वक्तव्य में, पोप ने “कथेड्रा” की विषयवस्तु पर विचार किया। पोप ने स्वीकार किया कि चिंतन इस बात की जानकारी से प्रेरित थी कि ख्रीस्तीयों की बुलाहट, लोगों के बीच मेलजोल पैदा करने की ओर है।
इसे ध्यान में रखते हुए, पोप ने कहा कि मेलजोल दूसरों का स्वागत करने, उनका आतिथि सत्कार करने और मदद करने की क्षमता से विकसित होता है।
मुलाकात की कृपा
पोप लियो ने कहा कि हर सच्चे स्वागत में, दिल में मुलाकात की कृपा से पैदा हुआ एक रिश्ता होता है। उन्होंने समझाया कि मुलाकात की इसी विशेषता के कारण “कथेड्रा” के चौथे संस्करण को युवाओं को समर्पित करने का फैसला किया गया।
पोप ने कहा, “ऐसे समय में जब सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव हो रहे हैं, युवा, जो स्वाभाविक रूप से समाज और कलीसिया के भविष्य हैं, पहले से ही इसके जीवंत और उत्पादक वर्तमान के हिस्से हैं।”
पोप ने कहा कि उनके सवाल और चिंताएँ हमें अपने रिश्तों में नवीनता लाने के लिए आमंत्रित करती हैं।
उन्होंने कहा, “युवाओं का स्वागत करने का मतलब है, सबसे पहले, उनकी आवाज सुनना, उनकी नजरों से मिलना, और यह पहचानना कि उनके जीवन और उनकी भाषाओं में, आत्मा काम करती रहती है और मौजूदगी एवं देखभाल के नए रास्ते सुझाती है।”
उपस्थिति और देखभाल
पोप ने कहा कि वे दो शब्दों, यानी "उपस्थिति" और "देखभाल" पर बात करना चाहते हैं, जो अतिथि-सत्कार के ख्रीस्तीय अर्थ को समझने में मदद करते हैं।
उन्होंने कहा, "हममें से हर कोई, जीवन के प्रथम क्षण से ही, एक सामाजिक वास्तविकता में बड़ा होता है," उन्होंने परिवार, पल्ली, स्कूल, यूनिवर्सिटी और काम की जगह का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इनमें से हरेक समाज के ऐसे मॉडल को दिखाता है जहाँ मनोवैज्ञानिक, न्यायिक, नैतिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहलू एक-दूसरे से मिलते हैं, और "पहचान बनाते हैं जिनका मुख्य काम मौजूदगी में ही तय होता है।"
पोप लियो ने जोर देकर कहा, "दूसरों के जीवन में उपस्थित रहने का मतलब है समय, अनुभव और मतलब बांटना, ऐसे मजबूत संदर्भ बिन्दु देना जिनसे दूसरे खुद को पहचान सकें और आगे बढ़ सकें।"
पोप ने कहा, "नाजरेथ के पवित्र परिवार की ओर देखते हुए, हर स्वागत करनेवाला समुदाय अपनी बुलाहट को फिर से खोज सके और सेवा के रास्ते पर खुद को सही रास्ते पर ले जाना सीख सके।"
पवित्र परिवार का अनुभव
पोप लियो ने कहा कि सुसमाचार की वह घटना जिसमें मरियम और जोसेफ येसु को ढूंढ नहीं पाते, और, दुःख में, मंदिर में तीन दिन बाद उन्हें पाते हैं, यह सिखाती है कि दूसरे की पहचान अपने आप नहीं होती बल्कि लगातार कोशिश से होती है।
पोप ने कहा, “हममें से हरेक के साथ ऐसा हुआ है कि हमने किसी ऐसे व्यक्ति या चीज को खो दिया जिससे हम बहुत ज्यादा जुड़े हुए थे। उस पल हमें एहसास होता है कि वह पहचान कितनी कीमती थी।”
उन्होंने कहा कि विश्वास के जीवन में भी ऐसा ही होता है। "हम अक्सर येसु की पहचान को तब तक ध्यान नहीं देते जब तक कि ऐसा नहीं लगता कि वे अब वहाँ नहीं हैं जहाँ हमने उन्हें छोड़ा था।"
येसु को खोजने के लिए बुलाये गये
पोप ने कहा, “हमें खोने का एहसास होता है।” “असल में, वह खोया नहीं है, बल्कि हम दूर चले गए हैं।”
पोप ने समझाया कि जब ऐसा होता है, तो हमें भरोसे के साथ और अनजाने रास्तों पर चलने की हिम्मत के साथ, उम्मीद से भरी नई आँखों से दुनिया को देखने के लिए प्रेरित किया जाता है।
उन्होंने कहा, “इस तरह, हम अपने हिसाब से बने ईश्वर को ढूंढना बंद कर देंगे और इसके बजाय उनसे वहीं मिलेंगे जहाँ वे रहते हैं।”
पोप लियो ने कहा कि येसु को खोजने का मतलब है अपने विश्वास की सुरक्षा से मिलने की जिम्मेदारी की ओर बढ़ना, और हमेशा "परे" रहनेवाले ईश्वर की उपस्थिति को देखना और उनका स्वागत करने सीखना।
संत जोसेफ का उदाहरण
पोप लियो ने कहा, “प्रभु द्वारा सौंपे गए परिवार की देखरेख करते हुए संत जोसेफ ने यही किया।”
पोप लियो ने कहा, “देखभाल करने का मतलब है, दूसरे के साथ खड़ा होना, उनकी पसंद का सम्मान करना और उनकी जिम्मेदारी लेना।”
उन्होंने कहा कि यह रवैया सबसे पहले ईश्वर का है, जिन्हें बाइबिल अपने लोगों के रखवाले के रूप में दिखाती है। उन्होंने समझाया कि मानव परिवार को भी, जो उन्हें सौंपा गया है, उसे सुरक्षित रखने के लिए कहा गया है।
पोप ने कहा, “इस तरह जोसेफ हमें दिखाते हैं कि उपस्थिति और देखभाल ऐसे पहलू हैं जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता: कोई उपस्थित हुए बिना सुरक्षा नहीं दे सकता, और कोई दूसरे की जिम्मेदारी लिए बिना सच में उपस्थित नहीं हो सकता।”
पवित्रता की ओर बढ़ना
इस भावना के साथ, पोप लियो ने सुझाव दिया कि उपस्थिति और देखभाल, अतिथि सत्कार के रास्ते पर दो दीयों की तरह हो सकते हैं जो पवित्रता के रास्ते खोल सकते हैं।
उपस्थित लोगों को उनके शांत और समझदारी भरे समर्पण के लिए धन्यवाद देते हुए, पोप ने उन्हें अतिथि सत्कार सिखानेवाले बनने और साथ मिलकर "ख्रीस्तीय समुदाय और समाज में अच्छाई एवं भाईचारे को बढ़ावा देनेवाले माहौल बनाने" के लिए हिम्मत दी।
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