संत  पापा लियो आमदर्शन समारोह में संत पापा लियो आमदर्शन समारोह में 

संत पापा लियोः कलीसिया का लक्ष्य मानवता में एकता

संत पापा लियो 14वें ने धर्मसिद्धांत लुमेन जेनसियुम पर चिंतन करते हुए कलीसिया को ईश्वरीय प्रजा का एक स्वरूप कहा जिसका लक्ष्य मानवता को एकता मे स्थापित करना है।

संत पापा लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात और सुस्वागतम्।

धर्म सिद्धांत लुमेन जेनसियुम पर चिंतन जारी रखते हुए आज हम उसके दूसरे अध्याय पर विचारमंथन करेंगे जो ईश प्रजा पर समर्पित है।

ईश्वर ने संसार और मानव की सृष्टि की, और वे हर मानव को बचाने की चाह रखते हैं। वे एक असल प्रजा का चुनाव करते और उनके साथ रहते हुए, मुक्ति के इतिहास में अपने कार्यों के माध्यम इसे जारी रखते हैं। यही कारण है, वे आब्रहम को बुलाते और उसकी संतत्ति को आकाश के तारों और समुद्र तट के कणों की तरह असंख्य बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं (उत्पत्ति 22. 17-18)। अब्राहम की संतानों का गुलामी से छुटकार उपरांत, ईश्वर उनके संग एक विधान स्थापित करते हैं, उसके संग चलते, उनकी देख-रेख करते और जब कभी वे भटक जाते तो उन्हें एक साथ पुनः एकत्रित करते हैं। अतः उन लोगों की पहचान ईश्वर के कार्य और उनमें विश्वास के कारण होती है। वे विश्व के दूसरे देशों लिए एक ज्योति बनने हेतु बुलाये जाते हैं, एक ज्योतिपुंज की भांति जो सभी लोगों को आकर्षित करती है, सारी मानवता को अपनी ओर (इसा.2.1-5)।

संत पापा का अभिवादन
संत पापा का अभिवादन

ईश प्रजा का स्वरूप

धर्मसभा इस बात को सुदृढ़ करती है कि “ये सारी चीजें, यद्यपि तैयार के द्वारा पूरी होती है जिसे हम एक नये और परिपूर्ण विधान के रुप में पाते हैं, जो ख्रीस्त में नवीन होने को था, और जिसकी परिपूर्णत शब्द के शरीरधारण में प्रकट होने वाली थी।” वास्तव में, यह ख्रीस्त हैं जो अपने को शरीर और लोहू स्वरूप अर्पित करते हुए, उन लोगों को अपने संग संयुक्त करते और उन्हें एक निश्चितता प्रदान करते हैं। यह अब वह प्रजा है जहाँ हम हर देश के लोगों को पाते हैं, वे विश्वास में उनके संग जुड़े हैं, उनके द्वारा संयुक्त वे अपने को उसी जीवन में साझा करते हैं जो पुनर्जीवित ईश्वर में पवित्र आत्मा के द्वारा संचालित किया जाता है। यह कलीसिया है- ईश्वर की प्रजा जिसका अस्तित्व येसु ख्रीस्त के शरीर से आता है, और जो स्वयं ख्रीस्त के शरीर हैं, किसी भी प्रजा की भांति नहीं बल्कि ईश्वर की प्रजा, जो उनके द्वारा एक साथ बुलाये गये हैं, जिन्हें नर और नारी के रूप में पूरी दुनिया के देशों में स्थापित किया गया है। इसे संयुक्त करने वाला मुख्य आधार एक भाषा, एक संस्कृति, एक जाति के लोग नहीं हैं बल्कि ख्रीस्त में विश्वास है- कलीसिया, इसीलिए जैसे कि धर्मसभा ने इसे एक वैभव रुप में परिभाषित किया है- “यह उन लोगों का मिलन है जो विश्वास में येसु की ओर निहारते हैं।”

विश्वासियों का अभिवादन करते हुए संत पापा लियो
विश्वासियों का अभिवादन करते हुए संत पापा लियो

ख्रीस्तीयों के मनोभाव

संत पापा ने कहा कि यह मुक्तिदाता की प्रजा है, खासकर हम इसमें ख्रीस्त, मसीह को पाते हैं जो उसका सिर है। वे जिनका संबंध उनके साथ है वे अपने में घमंड नहीं करते हैं बल्कि वे अपने को ख्रीस्त में और उनके द्वारा मिले उपहार, ईश्वर की संतान स्वरुप देखते हैं। किसी कार्य या उत्तरदायित्व से अधिक, इस भांति कलीसिया में यह महत्वपूर्ण है कि हम ईश्वर में संयुक्त रहें, ईश्वरीय कृपा में उनकी संतान बने रहें। ख्रीस्तीयों के रुप में यह भी हमारे लिए सम्मानजनक पहचान है जिसकी चाह हमें रखनी है। कलीसिया में हम पिता से निरंतर जीवन प्राप्त करने हेतु बुलाये जाते हैं जिससे हम उनकी संतान, अपने बीच भाई-बहनों स्वरूप जीवन जी सकें। इसके परिणाम स्वरुप कलीसिया में वह नियम प्रेम है जो हमारे संबंधों को सजीव बनाता है, जैसे कि हम इसे येसु ख्रीस्त में पाते हैं जिसका लक्ष्य ईश्वर का राज्य स्थापित करना है, जिसकी ओर वह सभी मानवता के संग मिलकर एक साथ चलती है।

संत पापा लियो का आशीर्वाद
संत पापा लियो का आशीर्वाद   (ANSA)

कलीसिया की चाहः मानवता में एकता

संत पापा लियो ने कहा कि ख्रीस्त, ईश्वर और मुक्तिदाता में हर नर और नारी का सुंयक्त होना, कलीसिया को अपने में बंद रहने के लिए अग्रसर नहीं करती है, बल्कि यह उसे हरएक के लिए और हर बात के लिए खुला रखती है। यदि ख्रीस्त में विश्वास करने वाले उससे संयुक्त होते, धर्मसभा हमें याद दिलाती है “सारी मानवता ईश्वर के संग नयी प्रजा होने के लिए बुलाई जाती है।” अतः वे लोग, अपने में एक और अद्वितीय बने रहते हुए, ईश्वर की इस योजना को सारी दुनिया और लोगों में प्रसारित करने को बुलाये गये हैं, जिन्होंने दुनिया के शुरू में मानव को एक स्वभाव स्वरूप गढ़ा और जिन्हें वे एक साथ जमा करने की चाह रखते हैं जो बिखर गये थे।” (एजी 13) यद्यपि वे जिन्होंने सुसमाचार को अब तक स्वीकार नहीं किया है, किसी न किसी रूप में भी, ईश्वर की प्रजा के संग जुड़े हैं, और कलीसिया अपनी प्रेरिताई में, ख्रीस्त के प्रेरितिक कार्यों में सहयोग करती है, वह सुसमाचार को हर जगह और हर किसी के लिए घोषित करने को बुलाई जाती है, जिससे हर किसी का संबंध येसु ख्रीस्त से स्थापित हो सके। (एजी 17) इन सारी बातों का अर्थ यही हुआ कि कलीसिया में, हर किसी के लिए लिए एक स्थान है और होना चाहिए, तथा हर ख्रीस्तीय अपने में सुसमाचार का प्रचार करने और हर परिस्थिति में जहाँ वह निवास और कार्य करता है, अपने कार्यों के माध्यम से साक्ष्य देने हेतु बुलाया गया है। इस भांति, ईश प्रजा अपनी ख्रीस्तीयता को प्रकट करती है, वह विभिन्न संस्कृतियों की समृद्धि और संसाधनों का स्वागत करती है, और वहीं वह उन्हें सुसमाचार की नवीनता को प्रदान करते हुए उन्हें शुद्ध करती और अपने से ऊपर उठने को मदद करती है (एजी, 13)

आमदर्शन समारोह

कलीसिया एक है

इस संदर्भ में, कलीसिया एक है लेकिन वह हर किसी को अपने में सम्माहित करती है। एक महान ईशशास्त्रीय इसका व्याख्या करते हुए कहते हैं, “मुक्ति के अद्वितीय द्वार को चाहिए कि वह सारी मानवता की विभिन्नता का स्वागत अपने विशाल नाव में करे। केवल एक भोज-मंडप में, जहाँ भोजन का वितरण किया जाता है, सृष्टि से प्राप्त होता है। ख्रीस्त का बिना सीवन वस्त्र, जो अपने में एक वही चीज है, योसेफ का वस्त्र, जो बहुरंगी है।”

संत पापा ने कहा कि यह आशा की एक बृहृद निशानी है- विशेष कर हमारे समय में, जहाँ हम इतने सारे संघर्षों और युद्धों से होकर गुजरते हैं- यह जानना कि कलीसिया एक ऐसा समुदाय है जिसमें अलग-अलग देशों, भाषाओं और संस्कृतियों के नर और नारियाँ विश्वास में एक साथ रहते हैं: यह मानवता के हृदय में रखी गई एक निशानी है, एकता और शांति की याद दिलाने वाली वह भविष्यवाणी है जिसके लिए पिता ईश्वर अपने सभी बच्चों को बुलाते हैं।

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11 मार्च 2026, 13:46