संत  पापा लियो आमदर्शन समारोह में संत पापा लियो आमदर्शन समारोह में 

संत पापाः कलीसिया की उत्पत्ति ईश्वर में - मानव हेतु

संत पापा लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा माला में विश्व प्रेरितिक पत्र लुमेन जेन्सियुम पर चिंतन करते हुए कलीसिया के सार पर प्रकाश डाला।

वाटिकन सिटी

संत पापा लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात और सुस्वागतम।

आज हम विश्व प्रेरितिक पत्र, कलीसियाई धर्मसिद्धांत लुमेन जेन्सियुम पर अपना चिंतन जारी रखते हैं।

इस प्रथम अध्याय, हमारे लिए मुख्यतः कलीसिया के सावल का उत्तर देने की कोशिश करता है कि वह क्या है, यह उसकी व्याख्या एक “जटिल सच्चाई” के रूप में करती है। अब, हम अपने में यह सवाल करते हैं, “यह जटिलता किन बातों को सम्माहित करती हैॽ” कुछ लोग इसके उत्तर में यह कहते हैं कि कलीसिया अपने में मिश्रित है जो उसे “जटिल” बनाती और इसी कारण उसकी व्याख्या करना कठिन है। वहीं दूसरे यह सोचते हैं कि उसकी जटिलता अपने में इस बात को सम्माहित करती है कि वह एक संस्थान है जिसका इतिहास दो हजार सालों से गढ़ा गया है, जिसकी विशेषताएं अपने में किसी सामाजिक और धर्मसंग समुदाय से भिन्न हैं। हालाँकि, लातीनी भाषा में, “कॉम्प्लेक्स” शब्द एक ही वास्तविकता के भीतर विभिन्न पहलुओं या आयामों के व्यवस्थित मिलन को इंगित करता है। इसी कारण से, लुमेन जेंसियुम इस तथ्य को सुदृढ़ करता है कि कलीसिया एक अति-सुसंगठित स्वरूप है, जिसमें हम मानव और दिव्य आयामों के सह-अस्तित्व को बिना किसी अलगाव और बिना किसी भ्रांति के पाते हैं।

कलीसिया का आयाम

संत पापा लियो ने कहा कि यहाँ हम इसके पहले आयाम को स्पष्ट रुप में देख सकते हैं, जहाँ हम कलीसिया को नर और नारियों को एक समुदाय स्वरुप पाते हैं जो ख्रीस्तीयों के रुप में अपनी खुशी और संघर्षों को एक दूसरों के संग साझा करते हैं। वे अपनी योग्यताओं और कमजोरियों में, सुसमाचार को घोषित करते और येसु ख्रीस्त की उपस्थिति की एक निशानी बनते हैं जो हमारी जीवन यात्रा में हमारे संग चलते हैं। यद्यपि यह आयाम, जो संस्थागत संगठन के रुप में स्पष्ट है- अपने में कलीसिया के वास्ताविक स्वभाव की व्याख्या करने को प्रर्याप्त नहीं है, क्योंकि हम इसमें एक दिव्य आयाम को भी पाते हैं। यह अपने सदस्यों की आदर्श पूर्णता या आध्यात्मिक श्रेष्ठता को सम्माहित नहीं करती है, बल्कि सच्चाई यह है कि कलीसिया का जन्म मानवता के लिए ईश्वर की योजना में हुई है जिसकी पूर्णत ख्रीस्त में होती है। अतः, कलीसिया को हम एक भौतिक समुदाय और येसु ख्रीस्त के रहस्यात्मक शरीर के रूप में पाते हैं, जो एक दृश्यमान समुदाय और एक आध्यात्मिक रहस्य है, यह इतिहास में उपस्थित एक सच्चाई और एक प्रजा है जो स्वर्ग की ओर यात्रा कर रही है।

संत पापा का अभिवादन
संत पापा का अभिवादन   (AFP or licensors)

संत पापा का अभिवादन]संत पापा लियो ने कहा कि हम यहाँ मानव और दिव्य आयामों को सामंजस्यपूर्ण ढंग से, एक दूसरे पर हावी हुए बिना, एकीकृत पाते हैं, इस भांति कलीसिया अपने में इस विरोधाभाव को वहन करती है। वह एक ऐसी सच्चाई है जो मानवीय और दैवीय दोनों है, जो पापी मानव का स्वागत करती है और उसे ईश्वर की ओर ले चलती है।

कलीसियाः ख्रीस्त का शरीर

कलीसिया की स्थिति प्रकाश डालने हेतु, लुमेन जेन्सियुम हमारे लिए ख्रीस्त के जीवन की ओर इंगित करता है। वास्तव में, वे जिन्होंने फिलस्तीन के मार्गों में येसु से मुलाकात की उन्हें उसका अनुभव हुआ, उनकी आंखें, हाथ और उनकी आवाज का। वे जिन्होंने उनका अनुसरण करने का निर्णय लिया उन्होंने विशेष रूप से अपने को उनके स्वागत किये जाने वाली निगाहों से अंचभित होता पाया, आशीर्वाद देने वाले उनके हाथों का स्पर्श, उनके शब्दों जिनमें मुक्ति और चंगाई थी। इसके साथ ही, उस व्यक्ति का अनुसरण करने के द्वारा शिष्यों ने अपने को एक ईश्वर से मिलन हेतु खोला। वास्तव में, ख्रीस्त का शरीर, उनका चेहरा, उनके इशारे और उनके शब्द प्रत्यक्ष रुप से अप्रत्यक्ष ईश्वर को घोषित करते हैं।

संत पापा का अभिवादन
संत पापा का अभिवादन   (ANSA)

कलीसिया इतिहास में मूर्त है

संत पापा लियो ने कहा कि येसु की सच्चाई के प्रकाश में, हम अब कलीसिया की ओर अभिमुख हो सकते हैं, जब हम उसे निकटता से देखते हैं, तो हम उसमें एक मानवीय आयाम को पाते हैं जो वास्ताविक लोगों में बनी है, जो कभी-कभी सुसमाचार की सुन्दरता को व्यक्त करते हैं, तो दूसरे समय में संघर्ष और गलतियों जो हर कोई करता है। हलांकि, यह विशेष रूप से उनके सदस्यों और उनके सीमित भौतिक जीवन के द्वारा ख्रीस्त की उपस्थिति और मुक्ति के उनके कार्य व्यक्त किये जाते हैं। जैसे कि संत पापा बेनेदिक्त 16वें ने इसे अपनी अभिव्यक्ति में कहा, हम सुसमाचार और संस्थान में कोई विरोद्धभाव नहीं पाते हैं, इसके विपरीत, कलीसिया की संरचनाएं खास रुप से “हमारे समय में सुसमाचार का साकार होना और उसके मूर्तरूप को” व्यक्त करने में मदद करती है।” एक आदर्श और शुद्ध कलीसिया, जो पृथ्वी से पृथ्क है, हम उसके अस्तित्व को नहीं पाते हैं, बल्कि ख्रीस्त की एक कलीसिया को हम, इतिहास में मूर्त रूप में पाते हैं।

संत पापा की धर्मशिक्षा

कलीसिया में ख्रीस्त की अभिव्यक्तिः छोटे कार्य में

वास्ताव में, येसु कलीसिया में निवास करते और निरंतर अपने को उसके छोटे और क्षणभंगुर सदस्यों स्वरुप हमें प्रस्तुत करते हैं। कलीसिया में होने वाले इस निरंतर चमत्कार पर चिंतन करते हुए, हम ईश्वर के कार्य करने के मनोभावों को समझते हैं-वे अपने को सृष्टि प्राणियों की कमजोरी में दृश्यमान बनाते हैं, इस तरह वे सदैव अपने को प्रकट करते और कार्य करते हैं। यही कारण हैं, संत पापा फ्रांसिस विश्व प्रेरितिक पत्र एंभेनजेली गौदियुम में इस बात की शिक्षा देते हैं, “दूसरों की पवित्र भूमि में हम अपने जूतों को उतारें” (निर्ग.3.5. 165)। यह हमें आज भी कलीसिया के निर्माण हेतु मदद करता है- न केवल प्रत्यक्ष चीजों को संगठित करते हुए बल्कि हमारे बीच में एकता और प्रेम के माध्यम आध्यात्मिकता की इमारत का निर्माण करते हुए जो स्वयं येसु ख्रीस्त हैं।

संत पापा का अभिवादन
संत पापा का अभिवादन   (ANSA)

संत पापा ने संत अगुस्टीन के विचारों को उद्धृत करते हुए कहा कि वास्तव में, प्रेम निरंतर पुनर्जीवित ईश्वर की उपस्थिति को व्यक्त करता है। “यदि हम सब सिर्फ एक विचार, प्रेम पर अपने को स्थापित करें, क्योंकि केवल यही वह चीज है, जो सारी चीजों पर विजयी होता है, इसके बिना सारी चीजें व्यर्थ हैं, जहाँ कहीं भी यह पाया जाता है, वह सारी चीजों को अपनी ओर आकर्षित करता है।”

Thank you for reading our article. You can keep up-to-date by subscribing to our daily newsletter. Just click here

04 मार्च 2026, 15:15