संत पापा लियोः कलीसिया एक रहस्य है
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थायात्रियों को संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात और सुस्वागतम।
वाटिकन द्वितीय महासभा जिसकी चर्चा हम धर्मशिक्षा में कर रहे हैं, कलीसिया के बारे में वर्णन करने हेतु इस बात पर चर्चा करती है कि सर्वप्रथम उसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई है। ऐसा करने के लिए उसने 21 नवम्बर 1964 को धर्मसिद्धांत लुमेन जेनसियुस में, संत पौलुस के पत्रों से एक शब्दावली “रहस्य” का चुनाव किया। इस शब्द के चुनाव द्वारा वह यह घोषित नहीं करना चाहती थी कलीसिया कोई अस्पष्ट या न समझे जाने वाली बात नहीं है, जैसे कि रहस्य के संबंध में एक सामान्य विचार हमारे लिए आता है। हम इसे ठीक इसके विपरीत पाते हैं, वास्तव में, संत पौलुस जब इस शब्द का उपयोग करते हैं विशेषकर ऐफेसियों के नाम अपने पत्र में, वे एक सच्चाई को प्रकट करने की चाह रखते हैं जो पहले गुप्त थी अब प्रकट हो गई है।
संत पापा लियो ने कहा कि यह ईश्वर की योजना के बारे में हमें कहता है, जिसका अपना एक उद्देश्य है- येसु ख्रीस्त में सृष्टि के सभी प्राणियों से मेल-मिलाप करना, जिसे उन्होंने क्रूस में अपने मरण द्वारा पूरा किया। इसकी अनुभूति हम सबसे पहले धर्मविधि के लिए एकत्रित होने में करते हैं जहाँ, विभिन्नाताओं को हम सापेक्ष पाते हैं और यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि हम अपने को एक साथ पाते हैं, क्योंकि हम सब अपने को ख्रीस्त के प्रेम से आकर्षित पाते हैं, जिन्होंने लोगों और समाज के बीच विभाजन की दीवार को ढ़ह दिया। संत पौलुस के लिए रहस्य ईश्वर का प्रकटीकरण है जिसे वे सारी मानवता के लिए पूरा करना चाहते हैं, और यह स्थानीय अनुभवों से पता चलता है, जहाँ वे धीरे-धीरे सारे लोगों को और यहाँ तक कि सारी पृथ्वी को शामिल करने की चाह रखते हैं।
संत पापा ने कहा मानवता की स्थिति को हम विभाजित पाते हैं जिसे मानव अपने में ठीक करने के योग्य नहीं है, यद्यपि एकता की चाह उनके हृदय में निवास करती है। येसु ख्रीस्त के कार्य इस स्थिति में पवित्र आत्मा के माध्यम शुरू होता है, जो विभाजन की शक्तियों और स्वयं विभाजक के ऊपर विजयी होते हैं। सुसमाचार की घोषणा में विश्वास करते हुए, समारोह हेतु एक साथ जमा होना, इसे मसीह के क्रूस द्वारा उत्पन्न आकर्षण के रूप में अनुभव किया जाता है, जो ईश्वर के प्रेम का सर्वोच्च प्रकटीकरण है। यह ईश्वर के द्वारा एक साथ बुलाये जाने की अनुभूति हैः यही कारण है कि हम “एक्कलेसिया” शब्द के उपयोग को पाते हैं, अर्थात लोगों की अनुभूति जो अपने में एक साथ बुलाये जाने का अनुभव करते हैं। अतः, हम रहस्य और कलीसिया के मध्य एक निश्चित संयोग को पाते हैं- कलीसिया वह रहस्य है जिसे समझा जा सकता है।
यह मिलन, क्योंकि यह विशेष रूप से ईश्वर के द्वारा होता है, केवल लोगों के समूह तक सीमित नहीं किया जा सकता है, लेकिन यह सारी मानव जाति की अनुभूति के लिए है। इसलिए, वाटिकन द्वितीय महासभा, धर्मसिद्धांत लुमेन जेनसियुस के शुरू में, कहती हैः “ख्रीस्त में कलीसिया एक संस्कार या एक निशानी और साधन की भांति है जो ईश्वर और सारी मानव जाति के संग एक गहरे रुप में जुड़ी है। “संस्कार” शब्द के उपयोग द्वारा और इसके परिणाम स्वरुप उसकी व्याख्या, इसका संदर्भ इस ओर इंगित करता है कि मानवीय इतिहास में, कलीसिया ईश्वरीय चाह की अभिव्यक्ति है जिसे पूरा करने की इच्छा रखते हैं, अतः कलीसिया की ओर देखते हुए, हम कुछ हद तक ईश्वर की योजना, रहस्य को समझ सकते हैं। इस अर्थ में, कलीसिया हमारे लिए एक निशानी है। इसके साथ ही, शब्द “साधन” को हम “संस्कार” से जुड़ा पाते हैं, विशेषकर जो हमें यह दिखलाती है कि कलीसिया एक सजीव निशानी है। वास्तव में, जब ईश्वर इतिहास में कार्य करते हैं, वे अपने कार्यों में लोगों को सम्मिलित करते हैं जो उनके कार्य करने के साधन होते हैं। यह कलीसिया है जिसके द्वारा ईश्वर अपने लोगों को अपने पास लाने और उन्हें एक दूसरे के संग संयुक्त करने के अपने लक्ष्य को पूरा करते हैं।
ईश्वर के संग मिलन की झलक इंसानों के मिलन में दिखती है। यह हमारे लिए मुक्ति का अनुभव है। यह कोई संयोग नहीं है कि धर्मसिद्धांत लुमेन जेनसियुस का अध्याय 7, जो यात्री कलीसिया का दुनिया में ईश्वारीय उपस्थिति को समर्पित है, इसे पुनः एक संस्कार के रुप में घोषित करती है, जिसमें हम विशेष रुपसे “मुक्ति के तथ्य” को पाते हैं- “ख्रीस्त, पृथ्वी से अपने ऊपर उठाये जाने के द्वारा सब लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेंगे (यो. 12.32) मृतकों में से जी उठने के द्वारा (रोम. 6.9) वे अपने जीवनदायी आत्मा को शिष्यों के लिए भेजा और उसके द्वारा अपने शरीर को स्थापित किया जो कलीसिया के रुप में वैश्विक मुक्ति का संस्कार है। पिता की दाहिनी ओर विराजते हुए, वे दुनिया में निरंतर सक्रिय हैं, जिससे वे ईशप्रजा को कलीसिया की ओर लाये, इसके द्वारा उन्हें अपने संग सम्मिलित करें और उन्हें अपनी महिमा के सहभागी बनायें जिसे वे अपने शरीर और रक्त से पोषित करते हैं।”
संत पापा लियो ने कहा कि यह पद हमें येसु के एकतामय कार्य, पास्का को समझने हेतु मदद करता है जो उनका दुःखभोग, मृत्यु और पुनरूत्थान है, जो कलीसिया की पहचान है। इसके साथ ही, यह हमें कलीसिया के संग संयुक्त होने हेतु कृतज्ञ बनाता है, येसु ख्रीस्त का पुनर्जीवित शरीर और इतिहास में एक तीर्थयात्री ईश प्रजा, जो अब भी विखंडित मानवता के बीच एक पवित्र उपस्थिति के रुप में, लोगों के बीच एकता और मेल-मिलाप की एक प्रभावकारी निशानी के तौर पर मौजूद है।
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