सन्त पापा लियो का राजनयिक दल को सम्बोधन
वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 9 जनवरी 2026 (रेई, वाटिकन रेडियो): वाटिकन में शुक्रवार को सन्त पापा लियो 14 वें ने रोम में सेवारत विश्व के राजनयिक दल के सदस्यों का अभिवादन कर उनके प्रति नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित की।
वाटिकन आये विभिन्न देशों के राजदूतों एवं गणमान्य प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए सन्त पापा ने कहा कि हालांकि यह परमधर्मपीठ से मान्यता प्राप्त राजनयिक दल के जीवन का एक परंपरागत अवसर है; तथापि उनके लिये यह एक नया अनुभव था, इसलिये इस कार्यक्रम में उपस्थित सभी गणमान्य राजदूतों एवं राष्ट्रों के प्रतिनिधियों और विशेष रूप से इस वर्ष नियुक्त कज़ाकस्तान, बुरुण्डी एवं बेलारूस के राजदूतों से मुलाकात कर वे अत्यन्त प्रसन्न थे।
सन्त पापा ने कहा विश्व के विभिन्न राष्ट्रों की सरकारों द्वारा रोम में कूटनैतिक प्रतिनिधियों का प्रस्थापन हमारे बीच विद्यमान अच्छे और फलदायी द्विपक्षीय संबंधों का ठोस संकेत है, जिसके लिये मैं आप सबके प्रति एवं आपकी सरकारों के प्रति आभारी हूँ। इस अवसर पर उन्होंने कहा, मैं बढ़ते तनाव और झगड़ों से परेशान हमारे समय पर एक आपके साथ अपने विचारों को साझा करना चाहता हूँ।
जयन्ती वर्ष
सन्त पापा ने स्मरण दिलाया कि अभी-अभी व्यतीत वर्ष में काथलिक कलीसिया ने जयन्ती वर्ष मनाया, जो कि कलीसियाई जीवन का एक बहुत गहरा अनुभव था। इसी के दौरान हमने अपने प्रिय सन्त पापा फ्राँसिस को अपने पिता के धाम लौटते देखा जिन्होंने महान प्रेरितिक उदारता के साथ अपने मेषपाल की रखवाली की थी।
सन्त पापा ने याद किया कि कुछ दिन पहले, हमने सन्त पेत्रुस महागिरजाघर का पवित्र द्वार बन्द किया जिसे सन्त पापा फ्राँसिस ने खुद 2024 में क्रिसमस की रात को खोला था। सन्त पापा ने कहा कि पवित्र वर्ष के दौरान, लाखों तीर्थयात्री अपनी जुबली तीर्थयात्रा करने के लिए रोम आए और अपने अनुभवों, सवालों एवं खुशियों और साथ ही दर्दों एवं घावों को साथ लेकर महागिरजाघरों के पवित्रद्वारों से गुज़रे, जो स्वयं हमारे स्वर्गिक वैद्य प्रभु ख्रीस्त के प्रतीक हैं। इस धरती पर देहधारण कर प्रभु येसु ख्रीस्त ने मानव रूप और स्वभाव धारण किया ताकि हम उनके ईश्वरीय जीवन के भागी बन सकें। सन्त पापा ने कहा, मेरा विश्वास है कि इस अनुभव ने बहुत से लोगों को येसु की पुनर्खोज में मदद प्रदान की और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की नवशक्ति प्रदान की है।
सन्त अगस्टीन के दो शहर
प्राचीन इतिहास के सन्दर्भ में सन्त पापा लियो ने सन् 410 ई. में रोम पर आक्रमण का ज़िक्र किया जिसपर सन्त अगस्टीन ने ईश्वर के शहर शीर्षक से अपनी कृति प्रस्तुत की है। उन्होंने कहा कि इसमें सन्त अगस्टीन दो प्रकार के शहरों की बात करते हैं। प्रथम है, आमोर देई अर्थात् ईश्वर का शहर जो अनन्त है तथा जिसकी विशिष्टता है ईश्वर का बिलाशर्त प्रेम और पड़ोसी के प्रति प्रेम, विशेषकर ग़रीबों एवं दीन दुखियों के प्रति प्रेम। फिर दूसरा है धरती का शहर, जो एक अस्थायी रहने की जगह है जहाँ इंसान मरने तक रहते हैं।
सन्त पापा ने कहा कि आज के समय में, धरती के शहर में परिवार से लेकर देश, राष्ट्र और अन्तरराष्ट्रीय संगठन, समस्त सामाजिक एवं राजनैतिक संस्थाएँ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सन्त अगस्टीन के लिए, यह शहर रोमन साम्राज्य का प्रतीक था। वास्वत में, सन्त पापा ने कहा, दुनिया का शहर आमोर सुई अर्थात् घमंड और खुद से प्यार पर आधारित है, वह दुनियावी ताकत और शोहरत की प्यास पर केंद्रित है जो तबाही की ओर ले जाती है। तथापि, सन्त पापा ने कहा, यह इतिहास का ऐसा पाठ नहीं है जो अनन्त को वर्तमान से अलग करने का प्रयास करता है, यह कलीसिया की तुलना किसी राज्य से नहीं करता और न ही यह नागर समाज में धर्म की भूमिका के बारे में कोई बहस है।
उन्होंने कहा कि सन्त अगस्टीन की दृष्टि में, ये दोनों शहर हमेशा साथ-साथ रहेंगे। हर शहर का एक बाहरी और एक अंदरूनी पहलू है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ़ इतिहास में जिस तरह से बाहरी तौर पर बनाया गया है, बल्कि ज़िंदगी की सच्चाई और ऐतिहासिक घटनाओं के प्रति हर इंसान के अंदरूनी नज़रिए से भी समझना होगा। इस दृष्टि से, हममें से प्रत्येक इतिहास का एक अभिनायक और इतिहास के लिए ज़िम्मेदार है।
हमारा युग
सन्त पापा लियो ने कहा कि हमारे युग में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बहुपक्षीयता की कमज़ोरी खास तौर पर चिंता की बात है। एक कूटनीति जो बातचीत को बढ़ावा देती है और सभी पार्टियों के बीच आम सहमति बनाने की कोशिश करती है, उसकी जगह ताकत पर आधारित कूटनीति ले रही है। युद्ध फिर से चलन में है और युद्ध का जोश फैल रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त रखा गया सिद्धांत, जो देशों को दूसरों की सीमाओं का उल्लंघन करने के लिए बल प्रयोग करने से रोकता था, पूरी तरह से कमज़ोर हो गया है।
शांति हथियारों से नहीं
सन्त पापा ने कहा, शांति अब एक वरदान और अपने आप में एक अच्छी चीज़ के तौर पर नहीं मांगी जाती, न ही उसे “ईश्वर की इच्छा से एक सुव्यवस्थित विश्व के निर्माण की कोशिश समझा जाता है, जिसमें स्त्री-पुरुषों शांति और न्याय के वातावरण में रह सकें।” इसके बजाय, शांति हथियारों के ज़रिए मांगी जा रही है, ताकि अपना दबदबा कायम किया जा सके, जिससे कानून भंग होता है जो शांतिपूर्ण नागरिकों के सहअस्तित्व की बुनियाद है।
सन्त पापा ने कहा कि मनुष्य के इसी व्यवहार ने द्वितीय की त्रासदी को भड़काया था, जिसकी राख से संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी और जिसका लक्ष्य दुनिया भर में होने वाली भावी तबाही को रोकना, शांति बनाए रखना, मानव के मूलभूत अधिकारों की रक्षा करना और धारणीय विकास को बढ़ावा देना है। सन्त पापा ने कहा कि इन लक्ष्य प्राप्ति हथियारों और सैन्य रणनीतियों पर निर्भर नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि युद्ध की तबाही के दौरान कम से कम इंसानियत की गारंटी देने के अलावा, देशों ने मानवीय कानून बनाने का वादा किया था उसे याद किया जाये। युद्धों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा और युद्ध के बाद पुननिर्माण आवश्यक है र राष्ट्रों की ज़िम्मेदारी है।
सन्त पापा ने कहा कि हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि अस्पताल, बिजली और पानी की आपूर्ति के लिये संरचनाएं, घरों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए ज़रूरी जगहों को नष्ट करना अन्तरराष्ट्रीय मानवीय कानून का गंभीर उल्लंघन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि परमधर्मपीठ सैन्य ऑपरेशन में आम लोगों के किसी भी तरह के शामिल होने की कड़ी निंदा करती है। साथ ही, यह उम्मीद करती है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय यह याद रखेगा कि मानव सम्मान और जीवन की पवित्रता के सिद्धांत की सुरक्षा हमेशा किसी भी देश के हित से ज़्यादा मायने रखती है।
भाषा का महत्व
सन्त पापा ने कहा कि यह दुखद तथ्य है कि आज लोग भाषा को विचारों के आदान प्रदान का जरिया नहीं मान रहे हैं, जबकि उसे यथार्थ सम्वाद का माध्यम होना चाहिये ताकि लोगों के बीच समझदारी उत्पन्न की जा सके और किसी भी प्रकार के तकरार को रोका जा सके। सन्त पापा ने कहा कि केवल भाषा को विचारों के आदान प्रदान का जरिया मानकर ही ग़लतफ़हमियों को दूर किया जा सकता तथा वास्तविक बातचीत फिर से शुरू हो सकती है। यह हमारे घरों और सार्वजनिक स्थलों पर, राजनीति में, मीडिया और सोशल मीडिया पर होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इसी तरह यह अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों और बहुपक्षीयता के मामले में भी होना चाहिए, ताकि बहुपक्षीयता को साक्षात्कार और मध्यस्थ बनने की अपनी भूमिका निभाने के लिए ज़रूरी ताकत वापस मिल सके। यह झगड़ों को रोकने के लिए ज़रूरी है, और यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी दूसरों पर ज़बरदस्ती, चाहे वह बोलकर हो, हाथ से हो या सैन्य तरीके से, ज़ोर-ज़बरदस्ती करने की सोच न रखे। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भाषा से ही सुनिश्चित्त की जाती है और इसकी हर सम्भव स्थिति में रक्षा की जानी चाहिये।
धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान
सन्त पापा ने कहा कि भाषा की तरह ही बहुत से देशों में धार्मिक स्वतंत्रता को कुंठित किया जा रहा है। सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें के शब्दों का स्मरण दिलाकर सन्त पापा ने कहा कि धर्म पालन की स्वतंत्रता सभी मानवाधिकारों में सबसे पहला है, क्योंकि यह इंसान की सबसे बुनियादी सच्चाई को दिखाता है। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराया कि सर्वाधिक नवीन आँकड़ों से पता चलता है कि धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बढ़ रहा है, और विश्व की 64 प्रतिशत आबादी इस अधिकार के गंभीर उल्लंघन से पीड़ित है। इस सन्दर्भ में सन्त पापा ने बांगलादेश, नाईजिरिया, अफ्रीका के साहेल क्षेत्र और सिरिया के दमिश्क में धार्मिक उत्पीड़न एवं हमलों चिन्ता व्यक्त की। यह निवेदन करते हुए कि ईसाइयों की धार्मिक स्वतंत्रता और आराधना-अर्चना का पूरा सम्मान किया जाए, सन्त पापा ने कहा, परमधर्मपीठ अन्य सभी धार्मिक समुदायों के लिए भी यही निवेदन करती है।
आप्रवासियों का सम्मान
इसी बीच, आप्रवासियों की व्यथा पर भी सन्त पापा लियो ने चिन्ता व्यक्त की और कहा कि परमधर्मपीठ प्रत्येक मनुष्य की प्रतिष्ठा के सम्मान का आह्वान करती है। उदाहरण के लिए, इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि हर आप्रवासी एक इंसान है और इसलिए उसके कुछ अहम अधिकार हैं जिनका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए।
जीवन का सम्मान
जीवन को ईश्वरीय वरदान मानने तथा उसके सम्मान का आग्रह कर सन्त पापा लियो 14 वें ने कहा कि प्रेम और जीवन की बुलाहट एक स्त्री और एक पुरुष के बीच खास और अटूट रिश्ते में एक अहम तरीके से प्रदर्शित होती तथा परिवारों को अजन्मे शिशु का स्वागत करने और उसकी पूरी देखभाल करने में मदद हेतु एक बुनियादी नैतिक ज़रूरत निरूपित करती है। यह विशेष रूप से उन देशों में प्राथमिकता बनती जा रही है, जहाँ जन्म दर में बहुत ज़्यादा गिरावट आ रही है। वस्तुतः, जीवन एक अनमोल वरदान है जो एक-दूसरे की मदद और सेवा पर आधारित एक समर्पित रिश्ते में परिणत हो जाता है।
सन्त पापा ने कहा कि जीवन को एक वरदान के तौर पर संजोकर रखने और परिवार को उसका ज़िम्मेदार रखवाला मानने की इस गहरी सोच को देखते हुए, हम ऐसी किसी भी काम को साफ़ तौर पर मना करते हैं जो जीवन की शुरुआत और उसके विकास को नकारती है या उसका फ़ायदा उठाती है। इनमें से एक है गर्भपात, जो एक बढ़ते हुए जीवन को छोटा कर देता है और जीवन के तोहफ़े को स्वीकार करने से मना कर देता है। इस बारे में, परमधर्मपीठ उन योजनाओं पर गहरी चिंता ज़ाहिर करती है जिनका मकसद तथाकथित “सुरक्षित अबॉर्शन के अधिकार” तक पहुँचने के लिए क्रॉस-बॉर्डर मोबिलिटी को फ़ाइनेंस करना है, क्योंकि यह परिवारों को समर्थन देने के बजाय जीवन को दबाने के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि पहला मकसद हर अजन्मे शिशु की सुरक्षा और हर महिला को प्रभावशाली और ठोस समर्थन देना होना चाहिए ताकि वह जीवन का स्वागत कर सके।
इसी प्रकार सन्त पापा लियो ने सर्रोगेसी और यूथानासिया जैसे अभ्यासों की निन्दा की और कहा कि नागर समाज और देशों की यह भी ज़िम्मेदारी है कि वे कमज़ोर हालात में ठोस जवाब दें, मानवीय कष्टों का हल बताएं, जैसे कि पैलिएटिव केयर और सच्ची एकजुटता की नीति को बढ़ावा दें।
युवाओं के प्रति सतर्कता
युवाओं के समक्ष प्रस्तुत चुनौतियों पर भी सन्त पापा ने ध्यान आकर्षित कराया ताकि वे मादक पदार्थों का लत तता अपराध जगत की कूनीतियों से बच सकें और स्वच्छ जीवन जी सकें। युवाओं के लिये विकास, शिक्षा और रोज़गार के मौके बनाने में ज़्यादा निवेश करने का उन्होंने आह्वान किया।
इन चुनौतियों को देखते हुए, सन्त पापा ने कहा हम ज़ोर देकर दोहराते हैं कि जीवन के अधिकार की सुरक्षा हर मानवाधिकार का ज़रूरी आधार है। एक समाज तभी स्वस्थ होता है और सही मायने में तरक्की करता है जब वह मानव जीवन की पवित्रता की रक्षा करता है और इसे बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से काम करता है।
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