संत पापा लियो- हम एक साथ चलें
वाटिकन सिटी
संत पापा लियो 14वें ने प्रभु प्रकाश का पर्व मानते हुए संत पेत्रुस के महागिरजाघर में यूख्रारिस्तीय बदलिदान अर्पित किया।
प्रिय भाइयो एवं बहनों, संत पापा ने अपने प्रवचन में कहा कि सुसमाचार हमारे लिए मजूषियों में बड़ी खुशी के अनुभव का जिक्र करता है जो तारा के पुनः एक बार दिखने के कारण होता है और इसके साथ ही यह हेरोद और पूरे येरूसालेम की चिंता के बारे भी कहता जो उन्हें मंजूषियों की खोज के कारण होती है। वास्तव में, हर बार सुसमाचार हमें ईश्वर के प्रकटीकरण के बारे में कहता है, जहाँ विरोधाभाव नहीं छुपाता जैसे कि खुशी और चिंता, प्रतिरोध और आज्ञाकारिता, भय और चाहत को पाते हैं। आज हम इस चेतना में प्रभु प्रकाश का त्योहार मनाते हैं कि उनकी उपस्थिति में कोई भी चीजें वैसे ही नहीं रह जाती हैं। यह हमारे लिए आशा की महत्वपूर्ण को व्यक्त करती है क्योंकि ईश्वर अपने को हमारे लिए व्यक्त करते हैं और सारी चीजें बदल जाती हैं। उनकी उपस्थिति हमारे जीवन की उदासी को दूर करती है जहाँ हम सदैव यह कहते हैं कि, “दुनिया में कोई भी चीज नई नहीं है।” हमारे लिए कुछ नया होता है जो हमारे वर्तमान और भविष्य को निर्धारित करता है जिसके बारे में नबी इसायस कहते हैं, “उठकर प्रकाशमान हो जा क्योंकि तेरी ज्योति आ रही है। और प्रभु- ईश्वर की महिमा तुझ पर उदित हो रही है।” (इसा.60.1)
येरुसालेम में भय
यह हमारे लिए आश्चर्य की बात है कि येरुसालेम शहर जहाँ बहुत सारी नई चीजें हुई अपने में चिंतित है। शहर के अंदर वे जो धर्मग्रंथ का अध्ययन करते, यह सोचते हैं कि उन्हें सारी चीजों का ज्ञान है, वे अपने में सवाल करने की क्षमता और एक जिज्ञासा की चेतना को खो देते हैं। वास्तव में, हम शहर को भयभीत पाते हैं, उन लोगों के द्वारा जो आशा से प्रेरित, दूर से चलते हुए आते हैं, शहर अपने में बड़ी खुशी का अनुभव करने के बदले भय के कारण कंपता जान पड़ता है। यह प्रतिक्रिया हम कलीसिया को भी चुनौतियाँ प्रदान करती है।
आशा के तीर्थयात्रियों को क्या मिलाॽ
संत पापा लियो ने कहा कि इस महागिरजाघर का पवित्र द्वार जो आज सबसे अंत में बंद हुआ अपने में असंख्य नर और नारियों- आशा के तीर्थयात्रियों, नये येरुसालेम की ओर यात्रा करते जिसके द्वार सदैव खुले रहते हैं, की एक बड़ी भीड़ को देखा। (प्रका.21.25)। ये नर और नारियाँ कौन थे, और उनका उद्देश्य क्या थाॽ इस जयंती वर्ष के अंत में, हमारी समकालीनों की आध्यात्मिक खोज, हमारी समझ से कहीं अधिक समृद्ध, हमें गंभीरता से विचार-मंथन करने को निमंत्रण देता है। लाखों की संख्या में लोगों ने कलीसिया के द्वार में प्रवेश किया। उन्हें क्या प्राप्त हुआॽ उनके हृदय में क्या था, उनके सवाल, उनकी अनुभूतियाँॽ हां, हम आज भी मंजूषियों के अस्तित्व को पाते हैं। आज भी लोग हैं जो अपने लिए खोज की आवश्यकता को पाते हैं, वे यात्रा की चुनौतियों को स्वीकारते, विशेषकर हमारी समस्या भरी दुनिया में जो अपने में दुखदायी और कई रुपों में खतरनाक हो सकती है।
मानव जीवन एक यात्रा
संत पापा ने मानव जीवन को एक यात्रा बतलाते हुए कहा कि सुसमाचार हमें इस यात्रा की चुनौतियों से भयभीत नहीं होने को कहता है लेकिन उनका स्वागत करते हुए उनके द्वारा ईश्वर की ओर अभिमुख होने का निमंत्रण देता है जो हमें पोषित करते हैं। वे एक ईश्वर हैं जो हमें विचलित कर सकते हैं क्योंकि वे चांदी और सोने की मूर्तियों की तरह हमारे हाथों में मज़बूती से नहीं रहते, बल्कि, वे ज़िंदा और जीवन देने वाले हैं, उस बच्चे की तरह जिसे मरियम ने अपनी बाहों में झुलाया और मंजूषियों ने जिसकी आराधना की। पवित्र स्थल जैसे की महागिरजाघर और तीर्थस्थल जो जयंती तीर्थयात्रा की निशानी बन गये हैं, उन्हें चाहिए कि वे जीवन की खुशबू को बिखेरें, एक न भूलने वाली अनुभूति को कि एक नई दुनिया की शुरूआत हो गई है।
हम अपने आप से पूछें- क्या हमारी कलीसिया में जीवन हैॽ क्या कुछ नई चीजों की उत्पत्ति के लिए स्थान हैॽ क्या हम एक ईश्वर को प्रेम करते और उन्हें घोषित करते हैं जो हमें एक यात्रा में आगे ले चलते हैंॽ
भय में अंधापन
संत पापा ने कहा कि सुसमाचार में हम हेरोद को अपने सिंहासन को लेकर और उन चीजों के बारे में भयभीत पाते हैं जो उसके नियंत्रण के परे हैं। वह मंजूषियों की बातों का लाभ उठाना चाहता है। वह झूठ के लिए तैयार है, वह कुछ भी करने को तैयार है। भय हमें सचमुच में अंधा कर देता है। उसके विपरीत सुसमाचार की खुशी हमें स्वतंत्र करती है। यह हमें सौम्य और निडर, सजग और क्रियाशील बनती है, यह हमें उन मार्गों में ले चलती है जो पहले से चले गये मार्गों से भिन्न है।
नई शुरूआत करें
संत पापा ने कहा कि मंजूषी एक सरल और जरूरी सवाल येरूसालेम लाते हैं- वह कहाँ है, जिसने जन्म लिया हैॽ (मत्ती.2.2)। यह कितना महत्वपूर्ण है कि जो लोग कलीसिया के द्वार से गुज़रते हैं, वे यह अनुभव करें कि मसीह का जन्म हुआ है, कि एक समुदाय इकट्ठा हो रहा है जिसमें उम्मीद की किरणें फूट रही हैं, और ज़िंदगी की एक कहानी उभर कर आ रही है। जयंती हमें इस बात की याद दिलाती है कि हम नये शिरे से शुरू कर सकते हैं, वास्तव में, हम शुरू के समय में हैं और ईश्वर हममें अपनी उपस्थिति को बढ़ाने की चाह रखते हैं, ईश्वर हमारे संग हैं। ईश्वर हमारे जीवन की स्थिति को चुनौती प्रदान करते हैं क्योंकि उनकी योजनाएँ हैं जो आज भी नबियों को प्रेरित करते हैं। ईश्वर हमें, नई और पुरानी दोनों चुनौतियों से बचाने को दृढ़ हैं। वे इसके लिए युवाओं और बुजुर्गों, गरीबों और धनियों, नर और नारियों, संतों और पापियों को अपनी करूणा और न्याय के आश्चर्यजनक कार्य में संलग्न करते हैं। यद्यपि वे ऐसा गुप्त रुप में करते हैं वे अपने राज्य को सारी दुनिया में प्रसारित करते हैं।
हेरोद के मनोभाव का परित्याग करें
हमने न जाने कितने प्रभु प्रकाश का त्योहार मनाया है और हमें कितने और भी मनाएंगे। फिर भी, वे हमें हेरोद के मनोभाव से दूर करें, भय से जो हममें क्रोध का रुप धारण करता है। “योहन बपतिस्ता के समय से लेकर आज तक ईश्वर के राज्य को हम हिंसा से प्रभावित पाते हैं, और हिंसा उसमें हावी रहती है” (मत्ती 11.12)। येसु की यह रहस्यमय अभिव्यक्ति हमें इस बात के चिंतन को अग्रसर करती है कि कितने ही संघर्ष हैं जिसका विरोध मानव करता है और जो नई चीजों को नष्ट करती है जिसे ईश्वर हममें से हर एक के लिए विचार करते हैं। प्रेम और शांति की खोज करना पवित्र चीजों की रक्षा करना है जिसमें हम छोटे, संवेदनशील, नये बच्चे के जन्म को पाते हैं। हमारे मध्य विकृत अर्थव्यवस्था सारी चीजों से लाभ उठाने की कोशिश करती है। हम बाजार को लोगों में इच्छा, खोजने, घूमने की चाहत में बदलता पाते हैं जो व्यापार का तब्दील हो जाता है। हम खुद से पूछें: क्या जयंती ने हमें इस तरह की योग्यता से अपने को दूर रखना सिखाया है जहाँ हर चीज़ एक उपभोक्त की वस्तु और मानव उसका उपभोगी बनाता हैॽ इस साल के बाद, क्या हम पर्यटक को एक तीर्थयात्री, अजनबी को एक खोजी, विदेशी को एक पड़ोसी और उन लोगों में सह यात्री स्वरुप पहचान पाएंगे जो हम से अलग हैंॽ
ईश्वर हमें हैरान करते हैं
येसु जिस रुप में हमसे मिलने आते उसके द्वारा हमें हृदय के रहस्यों की अहमियत का पता चलता है, जिन्हें सिर्फ़ वे ही पढ़ सकते हैं। उनके साथ, हम समय के संकेतों का स्वागत करना सीखते हैं। कोई भी उसे हमारे लिए बिक्री नहीं कर सकता है। बालक जिसकी आराधना मंजूषी करते हैं वह अपने में अमूल्य और अतुल्य है। यह हमारे लिए प्रभु प्रकाश का उपहार है। यह किसी बड़ी जगह पर नहीं, बल्कि एक छोटी-सी जगह पर होता है। “बेतलेहेम यूदा की भूमि। तू यूदा के प्रभुख नगरों में किसी से कम नहीं है क्योंकि तुझ से एक नेता उत्पन्न होगा, जो मेरी प्रजा इस्रारएल का चरवाहा बनेगा।” (मत्ती 2:6)। कितने शहरों, कितने समुदायों को यह सुनने की ज़रूरत है, “तू किसी भी तरह से सबसे छोटा नहीं है।” हाँ, प्रभु अब भी हमें हैरान करते हैं। वे खुद को दिखाते हैं और खुद को पाने देते हैं। उनके तरीके हमारे तरीके नहीं हैं, और हिंसक लोग उन्हें दबाकर रखने में कामयाब नहीं होते हैं, न ही दुनिया की ताकतें उन्हें रोक सकती हैं। यह उन मंजूषियों की बड़ी खुशी है, जिन्होंने बेतलेहम आने के लिए अपना सब कुछ पीछे छोड़ दिया, यह सिर्फ़ उस समय होता है जब वे एक बार फिर तारा देखते हैं।
एक साथ चलें
इस भांति, प्रिय भाइयो एवं बहनों, संत पापा ने कहा कि आशा के तीर्थयात्री होना अपने में अतिसुन्दर है। हमारा एक साथ यात्रा जारी रखना कितना सुन्दर है। ईश्वर की निष्ठा हमें विस्मित करती है। यदि हम अपने गिरजाघर को संग्रहालय न बनने दें, हमारे समुदाय निवास स्थल हों, यदि हम एक साथ खड़े हों और शक्तिशाली लोगों की चापलूसी और बहकावे का विरोध करें, तो हम एक नई सुबह की पीढ़ी होंगे। मरियम, भोग का तारा, हमेशा हमारे आगे चलेंगी। उसके बेटे में हम एक अनोखी मानवता के बारे में विचारेंगे और उसकी सेवा करेंगे, जो सबसे ताकतवर लोगों के धोखे से नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रेम से हमारे लिए शरीरधारण किया।
Thank you for reading our article. You can keep up-to-date by subscribing to our daily newsletter. Just click here
