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संत पापा लियो 14वें आमदर्शन समारोह में संत पापा लियो 14वें आमदर्शन समारोह में  (ANSA)

संत पापा लियोः वाटिकन द्वितीय एक मार्ग-दर्शक तारा

संत पापा लियो ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा में द्वितीय वाटिकन पर पुनः विचार करने का आहृवान करते हुए उसे कलीसिया के लिए मार्गदर्शक-निर्देशिका घोषित किया।

वाटिकन सिटी

संत पापा लियो ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर पौल षष्टम् के सभागार में विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात और स्वागतम्।

जयंती वर्ष के उपरांत, जहाँ हमने येसु ख्रीस्त के रहस्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया, अब हम अपनी धर्मशिक्षा माला में द्वितीय वाटिकन महा धर्मसभा पर एक नयी धर्मशिक्षा माला की शुरूआत करते हुए उसका पुनरावलोकन करेंगे। यह हमारे लिए एक अति मूल्यवान अवसर है जहां हम कलीसिया के इस घटना की सुन्दरता और महत्वपूर्णतः की पुनः खोज करेंगे। संत पापा जोन पौल द्वितीय ने सन् 2000 वर्ष की जयंती वर्ष के अंत में कहा, “मैं बीसवीं सदी में द्वितीय वाटिकन महा धर्मसभा को कलीसिया के लिए एक बड़ी कृपा के रुप में देखता हूँ।”

द्वितीय वाटिकन महा धर्मसभा पर चिंतन करें

निसिया धर्मसभा की वर्षगाँठ के साथ, सन् 2025 में हमने वाटिकन द्वितीय महासभा की 70वीं सालगिराह मनाई। यद्यपि समय जो हमें इसे अलग करती है वह अधिक लम्बी नहीं है, यह सत्य है कि द्वितीय वाटिकन महासभा में धर्माध्यक्षों की पीढ़ी, ईशशस्त्रियों और विश्वासीगण अब हमारे संग नहीं हैं। अतः हम इसके बुलावे को जो हमें इसकी प्रेरिताई को धूमिल नहीं करने का आहृवान करती है, और निरंतर भिन्न रूपों और माध्यमों में इसकी अंतर्दृष्टि को लागू करने पर जोर देती है, यह हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम इसे पुनः निकटता से जाने और हम ऐसा न केवल सुनी-सुनाई रूपों में करें, या उस रुप में जहाँ इसे परिभाषित किया गया है, लेकिन हम इस दस्तावेज का पुनः अध्ययन करते हुए इसकी विषयवस्तु पर चिंतन करें। वास्तव में, यह धर्मसिद्धांत कलीसिया की यात्रा में आज भी एक दिशा-निर्देशित करने वाले तारे की भांति है। जैसे कि संत पापा बेनेदिक्त 16वें ने हमें इसकी शिक्षा दी, “जैसे की साल बीत गये हैं, इस दस्तावेज ने अपनी महत्वूपर्णतः को नहीं खोया है, वास्तव में उसकी शिक्षा विशेष रुप से कलीसिया और वर्तमान वैश्विक नई परिस्थिति में महत्वपूर्ण सबित हुई है।”  (20 अप्रैल 2005  कार्डिनलों को  संदेश में)।

संत पापा लियो आमदर्शन समारोह में
संत पापा लियो आमदर्शन समारोह में   (ANSA)

कलीसिया को चुनौती

संत पापा लियो ने कहा कि 11 अक्टूबर 1962 को संत पापा जोन 13वें ने धर्मसभा की शुरूआत करते हुए इसे पूरी कलीसिया के लिए एक नये प्रभात स्वरुप घोषित किया। सभी महाद्वीपों की कलीसिया से एकत्रित हुए असंख्य धर्माधिकारियों ने एक नयी कलीसिया के लिए एक मार्ग प्रशस्त किये। बीसवीं सदी में एक समृद्ध धर्मग्रंथीय, ईशशास्त्रीय और धर्मविधिक विचार-मंथन के उपरांत द्वितीय वाटिकन धर्मसभा ने ईश्वर को पिता के चेहरे स्वरुप खोज निकाला, जो ख्रीस्त में, हमें अपनी संतान बनने को निमंत्रण देती है, यह कलीसिया को ख्रीस्त की निगाहों से देखती है, राष्ट्रों की ज्योति, ईश्वर और उनकी प्रजा के मध्य एकता और संस्कार के एक रहस्य के रुप में। इसमें धर्मविधि के संदर्भ में महत्वपूर्ण परिवर्तन की पहल की गई जिसके केन्द्र बिन्दु में मुक्ति के रहस्य और ईश प्रजा के सभी लोगों की सक्रिया और सचेतना में सहभागिता को स्थापित किया गया। इसके साथ ही, इसने हमें दुनिया के लिए अपने को खोलने और परिवर्तनों का आलिंगन करते हुए वार्ता और सह-उत्तरदायित्व के माध्यम आधुनिक दुनिया की चुनौतियों के प्रति खुला रहने को प्रेरित किया, एक कलीसिया के रुप में जो अपनी बाहों को मानवता के लिए खोलती, लोगों की उम्मीदों और चिंताओं का अनुसरण करती और एक अधिक न्यायपूर्ण और भ्रातृत्वमय समाज के निर्माण में सहयोग करती है।

कलीसिया की चाह सत्य की खोज

संत पापा लियो ने कहा कि हम वाटिकन द्वितीय महासभा के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं, जिसके फलस्वरूप हम कलीसिया में “कुछ बातों को पाते हैं जिसे वह कहना चाहती है, एक संदेश देना की चाह रखती, एक संचार करना चाहती है” (संत पाप पौल 6वें, विश्व प्रेरितिक पत्र, एक्लेसियम सुआम, 65), एकतावर्धक और अंतरधार्मिक वार्ता तथा दूसरे नेक दिली व्यक्तियों के संग वार्ता करते हुए सत्य की खोज करना चाहती है।

संत पापा का आशीर्वाद
संत पापा का आशीर्वाद   (ANSA)

ईश्वर का स्थान प्रथम  

संत पापा ने कहा कि यह प्रेरणा, यह आंतिरक मनःस्थिति, कलीसिया की आध्यात्मिक और प्रेरितिक कार्यो की विशेषता को बनाये रखे, क्योंकि हमें अब भी प्रेरितिक कलीसिया के रुप में पूरी तरह परिवर्तन लाना बाकी है, आज की चुनौती भरी स्थिति में, हमें समय की मांग के अनुरूप अपनी प्रेरिताई को परिभाषित करने का निमंत्रण दिया जाता है, सुसमाचार के आनंदमयी प्रचारक, न्याय और शांति के सहासपूर्ण साक्षी बनने को बुलाया जाता है। वाटिकन द्वितीय महासभा के शुरू में, मान्यवर अल्बिनो लुचीयानी, जो संत पापा योहन पौल प्रथम हुए, वित्तोरियो बेनेतो के धर्माध्यक्ष स्वरुप लिखा, “हमेश की तरह, हमें अत्यधिक संगठनों या प्रणालियों या संरचनाओं को हासिल करने की जरुरत नहीं है जितना की गहरी और विस्तृत पवित्रता प्राप्त करने की...ऐसा हो सकता है कि धर्मसभा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिफल सदियों के बाद दिखाई दे और यह कठिन तथा जटिल स्थितियों पर मेहनत से विजय प्राप्त करते हुए प्रौढ़ता को प्राप्त करे। धर्मसभा का पुनः अवलोकन करना, जैसे कि संत पापा फ्रांसिस ने हमारा ध्यान आकर्षित करते हुए कहा, यह हमें ईश्वर को प्रथम स्थान देने में मदद करती है, जो जरूरी हैः एक कलीसिया जो अपने ईश्वर से बेइंतहा प्रेम करती और अपने सभी नर-नारियों से जिन्हें वे प्रेम करते हैं।

संत पापा लियोः वाटिकन द्वितीय पर धर्मशिक्षा

द्वितीय वाटिकनः मार्गदर्शक सिद्धांत

प्रिय भाइयो एवं बहनों, संत पापा ने कहा कि संत पौल 6वें के शब्द जिसे उन्होंने वाटिकन द्वितीय के अंत में धर्माध्यक्षों को संबोधित करते हुए कहा कि यह हमारे लिए आज भी एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रुप में कार्य करती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समय आ गया है हमें धर्मसभा को छोड़कर मानव समाज में सुसमाचार की घोषणा करने हेतु बाहर जाने की आवश्यकता है, इस सचेतना में कि उन्होंने कृपा का अनुभव किया था जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य एक साथ समाहित थेः “अतीत,जो हमारे पास ख्रीस्त की कलीसिया अपनी परंपरा, इतिहास, धर्मसभों, उसके आचार्यों, संतों, वर्तमान में, यहाँ इस स्थल पर उपस्थिति है, क्योंकि हम एक-दूसरे से विदा लेकर आज दुनिया की ओर जाते हैं जिसमें दुःख हैं, जिसमें तकलीफें, पाप हैं, इसके साथ ही इसमें बड़ी कामयाबियाँ हैं, इसके मूल्य, इसके गुण के साथ अंततः एक भविष्य जहाँ लोग न्याय और शांति की चाह रखते हैं, वे अपनी चेतना या अचेतना में एक ऊंचे जीवन के प्यासे हैं, जिसके विशेष रुप से ख्रीस्त की कलीसिया उन्हें देने की चाह रखती और दे सकती है।” (संत पापा पौल 6वें, वाटिकन महा धर्मसभा के धर्माध्यक्षों को संदेश, 8 दिसम्बर 1965)

संत पापा का आशीर्वाद
संत पापा का आशीर्वाद   (ANSA)

ईश्वर का राज्य

हमारे लिए यह भी सत्य है। जैसे हम वाटिकन द्वितीय महासभा की ओर आते और उसके प्रेरितिक और समकालीन महत्वपूर्णतः का पुनरावलोकन करते हैं, हम कलीसिया में उसकी समृद्ध परंपरा का स्वागत करते हैं, वहीं हम वर्तमान के बारे में सवाल करते और दुनिया की ओर जाते हुए अपनी खुशी को नवीन करते हैं जहाँ हम ईश्वरीय राज्य, प्रेम, न्याय और शांति का एक राज्य स्थापित करने की चाह रखते हैं।

 

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07 जनवरी 2026, 16:17