साईप्रस में संत पापा की प्रेरितिक यात्रा साईप्रस में संत पापा की प्रेरितिक यात्रा 

संत पापाः हम भ्रातृत्वमय कलीसिया का निर्माण करें

संत पापा फ्रांसिस ने साईप्रस की प्रेरितिक यात्रा के प्रथम दिन कलीसिया के प्रेरिताई कार्य में हाथ बंटाने वालों से भेंट करते हुए भ्रातृत्वमय कलीसिया के निर्माण हेतु आहृवान किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, गुरूवार, 02 दिसम्बर 2021 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने साईप्रस की अपनी प्रेरितिक यात्रा के पहले दिन मरोनाईट कृपाओं की माता के महागिरजाघर में धर्माध्यक्षों, पुरोहितों, धर्मबंधुओं और धर्मबहनों से मुलाकात की।

संत पापा ने कलीसिया के विभिन्न प्रेरिताई और सेवा के कार्यों में संलग्न सभों के प्रति अपने हृदय से कृतज्ञता के भाव प्रकट किये। उन्होंने शिक्षण संस्थानों और कठिन परिस्थितियों में भी सामाजिक कार्य में सेवा दे रही धर्मबहनों के प्रति अपने आभार व्यक्त किये।

संत पापाः एक तीर्थयात्री

अपनी इस प्रेरितिक यात्रा को संत पापा ने प्रेरित बरनाबस, जो येसु ख्रीस्त के प्रिय शिष्य स्वरुप निर्भीकता में सुसमाचार का प्रचार किया, के पदचिन्हों का अनुसार कहते हुए एक तीर्थ की संज्ञा दी। संत पापा ने कहा कि उन्होंने प्रथम ख्रीस्तीय समुदायों की भेंट करते हुए उनके मध्य ईश्वर के कार्य देखें और आनंद में “ईश्वर में निष्ठावान बने रहने का आहृवान किया” (प्रेरि.11.23)। “मैं उन्हीं मनोभावों के साथ आपकी इस भूमि पर आता हूँ जिससे आप ईश्वर के अभूतपूर्व कार्यों को बिना निराश और हताश हुए अपने जीवन में बनाये रख सकें”।

संत पापा ने मरोनाईट कलीसिया का अभिवादन किया जो विभिन्न चरणों में साईप्रस द्वीप आये और विभिन्न कठिनाइयों का सामना करते हुए भी अपने विश्वास को बनाये रखा। इस संबंध में संत पापा ने लेबनान की चर्चा की जो विभिन्न तरह की कठिनाइयों और हिंसात्मक त्रासदियों से जूझ रही है जिन्हें वे अपने हृदय के करीब रखते हुए शांति हेतु प्रार्थना करते हैं। “धर्मग्रंथ में हम लेबनान के देवदारों की सुन्दरता की चर्चा सुनते हैं जो अपनी जड़ों के कारण धीरे से बढ़ते हैं, आप साईप्रस में उन्हीं जड़ों की भांति हैं जो सुसमाचार की खुशबू बिखेर रहे हैं”।

संत पापा ने सदियों से उपस्थित साईप्रस में लातिनी कलीसिया का भी अभिवादन किया। उन्होंने साईप्रस में प्रवासी भाई-बहनों की उपस्थिति को एक सच्ची मिलन का केन्द्र-बिन्दु कहा जो साईप्रस को यूरोपीय महाद्वीप में एक सुनैली भूमि बनाती है। “ख्रीस्तियों के रुप में कलीसिया सभों के लिए एक खुली जगह है जहाँ हम ईश्वर की करूणा और प्रेम का एहसास करने हेतु आमंत्रित किये जाते हैं”। ख्रीस्तीय कलीसिया में दीवारें न हों और नहीं होना चाहिए क्योंकि यह सभों का घर है, जहाँ हम विभिन्नताओं में सभों से संबंध बनाते हैं।

प्रेरित बरनाबस के दो गुण

संत बरनाबस के जीवन में धैर्य की चर्चा करते हुए संत पापा ने कहा कि वे विश्वास और विवेक के महा व्यक्तित्व थे जिन्हें येरूसलेम की कलीसिया ने चुना था। वे आंतखिया की कलीसिया द्वारा विभिन्न स्थानों में विश्वासियों की देख-रेख हेतु भेजे गये। उन्होंने विभिन्न स्थानों से विभिन्न संस्कृति और धर्मों के लोगों को आते हुए देखा। उन्होंने लोगों में विश्वास के उत्साह को देखा यद्यपि वह अपने में कमजोर था। ऐसी परिस्थिति में बरनाबस अपने में एकदम धैर्यवान बन रहे और लोगों की नयी बातों को बिना पक्षपात विचार से सुना। संत पापा ने कहा कि वे विचारमंथन में धैर्यशील थे जिसके फलस्वरुप उन्होंने दूसरी संस्कृतियों और परपराओं का अध्ययन किया। उनका सहचर्य धैर्यपूर्ण था जिसके फलस्वरुप उन्होंने नये विश्वासियों के प्रति कठोरता और अलचीलेपन के भाव नहीं रखें या न ही उन्होंने नियमों के अनुपालन में उनसे बहुत अधिक मांग की। उन्होंने हाथ पकड़ कर और उनके साथ वार्ता करते हुए उन्हें आगे ले चला।

कलीसिया धैर्य बने

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि हमें एक धैर्यपूर्ण कलीसिया की जरुरत है। एक कलीसिया जो परिवर्तन से विचलित नहीं होती बल्कि शांति में नवीनता और सुसमाचार के प्रकाश में परिस्थितियों पर चिंतन करती है। इस द्वीप पर अपने वाले भाई-बहनों का स्वगत करना अपने में मूल्यवान कार्य है। बरनाबस की भांति हमें धैर्य और सजगता में ईश्वर के द्वारा आने वाली निशानियों को देखना है जो अपने आलिंगन से किसी को वंचित नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि साईप्रस कलीसिया की बाहें स्वागत करने, अपने समुदाय का अंग होने और एक साथ चलने हेतु खुली है जो सम्पूर्ण यूरोपीय कलीसिया के लिए एक संदेश है जहाँ हम विश्वास की समस्या को पाते हैं। हमें सुसमाचार की घोषणा धैर्य में नई पीढ़ी हेतु करनी है। संत पापा ने अपने धर्माध्यक्ष भाइयों से भी निवेदन किया कि वे धैर्य में लोकधर्मियों के निकट रहें, बिना थके प्रार्थना में ईश्वर की खोज करें, अपने पुरोहितों से मिले और अन्य धर्मों के अनुयायियों का चाहे वे कहीं भी रहें दूसरों आदार और सम्मान करें। पुरोहितों को संत पापा ने कहा कि वे लोकधर्मियों के प्रति धैर्यवान बने रहें, सदैव उन्हें प्रोत्साहित करने को तैयार रहें और बिना थके ईश्वरीय प्रेम और क्षमा के वाहक बनें। “आप कठोरता में किसी के प्रति न्याय न करें बल्कि प्रेमी पिता बनें”। ईश्वर हर व्यक्ति में अपने एक “पवित्र इतिहास” को पूरा करते हैं हम इस बात से प्रेरित हों। लोगों की विविधता भरी स्थिति में धैर्यवान होने का अर्थ अपने कान और हृदय को दूसरी आध्यात्मिकता, दूसरे विश्वास और दूसरी संस्कृति के लिए संवेदनशील बनाना है। कलीसिया सभी चीजों को एकरूपता में सीमित करना नहीं चाहती है बल्कि धैर्य में सभी बातों को एकता में लाना चाहती है।

साथ चलें

बरनाबस के दूसरे पहलू की चर्चा करते हुए संत पापा ने कहा, “बरनाबस उसे लिया”। संत पौलुस के मनपरिवर्तन के बाद भी वे उन से भयभीत थे क्योंकि वह ख्रीस्तियों को बेरहमी से सताया करता था। लेकिन बरनाबस उन्हें ख्रीस्तियों के समुदाय में ले जाते, उनके बारे में बतलाते और उनका साक्ष्य देते हैं। संत पापा ने कहा कि यह हमें येसु का अपने शिष्यों के संग गलीलिया की राहों में चलने और मानवता के पापों को अपने ऊपर लेने को इंगित करता है। यह हमें येसु की मित्रता और हमारा उनके जीवन में सहभागी होने को दिखलाता है। “अपने में लेना”, “अपने ऊपर लेना” दूसरों के इतिहास में शामिल होने को दिखलाता है जो भ्रातृत्व की निशानी है।  

संत पापा ने कहा कि बरनाबस और पौलुस ने एक साथ यात्रा करते हुए सुसमाचार का प्रचार किया। पवित्र आत्मा की प्रेरणा से ईश्वर के वचन का प्रसार होता गया। लेकिन बाद में जैसा की हमारे जीवन में होता है एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी जिसके फलस्वरुप दोनों एक दूसरे से अलग हो गये। वे व्यक्तिगत कारणों से अलग नहीं हुए बल्कि प्रेरिताई कार्य में असहमति के कारण उनका अलगाव हुआ। उनके बीच में तर्क-विर्तक हुआ लेकिन बाद में हम उनके बीच भ्रातृत्व की भावना को पाते हैं जो संत पौलुस के पत्रों में व्यक्त होता है (2 तिम.4.9,11)। कलीसिया में भ्रातृत्व का अर्थ यही है हम अपनी सोच-विचार में भिन्न हो सकते हैं। कुछ निश्चित परिस्थितियों में अपनी बातों को खुले रुप में व्यक्त करना हमारे लिए एक अवसर बनता है जिसके फलस्वरुप हम विकास करते और हममें परिवर्तन आता है। संत पापा ने कहा कि हम सदैव इस बात को याद रखें कि हमारे तर्क-वितर्क अपने विचारों को थोपने हेतु नहीं लेकिन पवित्र आत्मा की शक्ति की अभिव्यक्ति हेतु होती है जो हमें प्रेम और एकता में पिरोता है। हम वाद-विवाद करने के बाद भी भाई-बहनें बने रहते हैं।

भ्रातृत्वमय कलीसिया

संत पापा ने इस बात पर जोर दिया की हमें एक भ्रातृत्वमय कलीसिया की जरुरत है जो विश्व में भ्रातृत्व के भाव उत्पन्न करती हो। साईप्रस में बहुमुखी आध्यात्मिकता और कलीसियाई संवेदनशीलता है, हम इतिहास के विभिन्न पृष्टभूमि में विभिन्न रीतियों और परंपराओ को देखते हैं। यह हमारे लिए खतरे का कारण न बने, न ही हम एक दूसरे से ईर्ष्या का अनुभव करें। यदि हम इस प्रलोभन में गिरते तो हम अपने में भय का अनुभव करते हैं जो अविश्वास को जन्म देती और अविश्वास के कारण शंका उत्पन्न होती जो देर-सबेर संघर्ष में बदल जाती है। हम सभी एक पिता के भाई-बहनें हैं। उन्होंने कहा कि आप अपने भ्रातृत्व की भावना में सारी दुनिया को इस बात की याद दिलाते हैं कि हमें एक साथ मिलकर अच्छी मानवता का निर्माण करना है, विभाजनों पर विजय पानी है, दीवारों को गिराना है, सपने देखते हुए एकता हेतु कार्य करना है। हमें एक दूसरे का स्वागत करते हुए एकता में बन रहते हुए भाई-बहनों के रुप में एक साथ चलना है।

 

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संत पापा फ्रांसिस की साईप्रस प्रेरितिक यात्रा
02 दिसंबर 2021, 16:34