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2026.04.20 सिस्टर मेरी-पास्कालीन और श्रीमति नौचका 2026.04.20 सिस्टर मेरी-पास्कालीन और श्रीमति नौचका 

डीआर कांगो: येसु के पवित्र हृदय की धर्मबहनें एचआईवी/एड्स पीड़ितों की सेवा कर रही हैं

प्रजातांत्रिक गणराज्य कांगो के किंशासा में, येसु के पवित्र हृदय की धर्मबहनें एक उत्कट मिशन पर काम कर रही हैं: एचआईवी/एड्स से पीड़ित लोगों की गरिमा वापस लाना। यह बीमारी आज भी एक बहुत दर्दनाक सच्चाई है जो कई लोगों की ज़िंदगी को गहराई से घायल करती है।

सिस्टर दोरोथी सिंदानी,आरएससीजे

किंशासा, मंगलवार 5 मई 2026 : हमारी घायल दुनिया में, कुछ लोग एचआईवी के साथ चुपचाप जीते हैं, जो अंदर की तकलीफ़, अस्वीकृति के डर, अपनी हालत पर शर्म और दूसरों के फैसले के बोझ से भरा होता है।

एचआईवी रोगी होने का मतलब है शारीरिक तकलीफ़ और बदनामी, यही वजह है कि इससे प्रभावित कई लोग अक्सर चुप रहना पसंद करते हैं, अपने परिवार या समाज द्वारा अस्वीकृत किए जाने के डर से अपनी बिमारी छिपाते हैं।

“फ्रेंड्स ऑफ़ सोफ़ी” ग्रुप के ज़रिए मेडिकल मदद और आध्यात्मिक मार्गदर्शन देकर, ये समर्पित महिलाएं निराशा को एक नई शुरुआत में बदल देती हैं।

दया और हमेशा साथ देने का मिशन

येसु के पवित्र हृदय की धर्मबहनों के धर्मसमाज के करिश्मे से प्रेरित होकर, जो येसु के दयामय प्रेम का प्रतीक है, धर्मबहनें एचआईवी से पीड़ित लोगों को बिना जज किए, स्वागत करती हैं, रोज़ाना के आसान कामों और ध्यान से सुनने से, वे उन्हें याद दिलाती हैं कि बीमारी किसी इंसान की अहमियत तय नहीं करती।

येसु के पवित्र हृदय की धर्मबहनें जो मदद देती हैं, वह इस तरह से की जाती है कि बीमारी के समय इंसान की गरिमा बनी रहे। इसमें बड़ों और उन बच्चों को नैतिक और आर्थिक मदद देना शामिल है जिन्हें अभी भी अपनी हालत के बारे में पता नहीं है।

आध्यात्मिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक और सामान से जुड़ी मदद

“फ्रेंड्स ऑफ़ सोफ़ी” ("सोफी के दोस्त") संस्था को  आधिकारिक तौर पर 2019 में बनाया गया था, लेकिन उससे बहुत पहले, सिस्टर मेरी-पास्कालीन एकोसोनी, आरएससीजे, ने एचआईवी से पीड़ित एक परिवार को अपनी मदद की पेशकश की थी। जब कोई व्यक्ति अपनी हालत को स्वीकार नहीं करता है, तो उसे मानसिक दिक्कतें हो सकती हैं।

इससे बचने के लिए, सिस्टर मेरी-पास्कालीन ध्यान से सुनती हैं, जिसका मकसद मरीज़ों की बीमारी का सामना करते समय उनके आत्म-विश्वास और हिम्मत को मज़बूत करना है। धर्मसमाज की संस्थापिका, संत मैग्दलीन सोफ़ी बारात के नाम पर, यह ग्रुप बीमार लोगों को संत के दोस्त के रूप में देखता है, जिनका एक सच्चे आध्यात्मिक परिवार में स्वागत किया जाना चाहिए, बिना किसी भेदभाव के।

आध्यात्मिक, नैतिक और मनोवैज्ञानिक मदद के अलावा, धर्मबहनें दूध, मक्के का आटा, चीनी, चावल…) भी देती हैं, जो प्यार से दी जाती है, जिससे मरीज़ों को इलाज के दौरान फिट रहने और भूख से परेशान नहीं होना पड़ता है।

तकलीफ़ से उम्मीद की गवाही तक

पैंतीस साल की श्रीमति नौचका, जो "सोफिया के दोस्त" संस्था की  सदस्य हैं, अपनी कहानी साझा करने के लिए राज़ी हुई हैं। अपनी माँ से संक्रमित होने के बाद एचआईवी के साथ पैदा हुईं। उनके जन्म के कुछ साल बाद माँ मौत हो गई, वह तीन भाई-बहनों में दूसरी थीं। वे सभी एचआईवी से संक्रमित थे, लेकिन उन्हें अपनी स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

वे कहती हैं, “हमें अपनी स्थिति के बारे में पता नहीं था”, लेकिन उन्हें याद है कि “पड़ोस के लोग कहते थे: ‘इन बच्चों की माँ एचआईवी/ एड्स से मर गई।’” बदकिस्मती से, सबसे छोटा बच्चा ज़िंदा नहीं बचा। अपने परिवार और समाज से अस्वीकृत होने के कारण उन्हें गहरे ज़ख्म मिले।

छोड़ दिए जाने की वजह से, मिस नौचका को बहुत तकलीफ़ हुई, जिसके कारण उन्होंने इलाज छोड़ दिया और अवसाद (डिप्रेशन) में चली गईं। वे बताती हैं, “मैं अब जीना नहीं चाहती थी।” कई और लोगों की तरह, उन्हें भी अपनी स्थिति शर्मनाक लगी, एक ऐसा बोझ जिसे उठाना नामुमकिन था, यह एहसास एचआईवी के साथ जी रहे कई लोगों में आम है।

'सोफिया के दोस्त' खाने के पैकेट तैयार कर रहे हैं
'सोफिया के दोस्त' खाने के पैकेट तैयार कर रहे हैं

एक मुलाकात जिसने ज़िंदगी वापस ला दी

श्रीमति नौचका की सिस्टर मेरी-पास्कालीन एकोसोनी से मुलाकात उनकी ज़िंदगी का एक अहम पल साबित हुई। उनका सम्मान और प्यार से स्वागत किया गया, बिना किसी को जज किए या बुरा-भला कहे उनकी बात सुनी गई, श्रीमति नौचका को धीरे-धीरे फिर से जीने की उम्मीद मिली।

वे बताती हैं, “यह मुलाकात उम्मीद की एक किरण थी। मैंने अपनी ताकत वापस पाई और जीने का फैसला किया।” इस समर्थन से, वह कलीसिया का एक ऐसा चेहरा देख पाईं जो देखभाल करती है, किसी को फिर से ऊपर उठाती है और ठीक करती है।

ठीक होने का प्रक्रिया आसान नहीं थी। श्रीमति नौचका मानती हैं कि उन्होंने गुस्से और विद्रोह के दौर का भी अनुभव किया। वे कहती हैं, “जब मुझे समझ में आया कि मैं कैसे संक्रमित हुई, तो मैं ईश्वर और खासकर अपनी माँ की बुराई करने लगी थी। क्योंकि उन्हें हमारी रक्षा करनी चाहिए थी।”

आज वह एक तीन साल के लड़के की माँ है, जो कड़ी मेडिकल देखभाल की वजह से एचआईवी -नेगटिव है। हालाँकि लड़के के पिता ने उसे ठुकरा दिया है और छोड़ दिया है, श्रीमति नौचका हिम्मत और गरिमा के साथ अपना सफ़र जारी रखे हुए है।

अब वह शर्म में जीना नहीं चाहती। वह कहती है, “यह हालत अब मेरे लिए कोई बाधा नहीं है।” जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध, वह अभी दूसरों को नियमित दवा लेने और इंसानी रिश्तों में ज़िम्मेदार होने के लिए बढ़ावा दे रही है, ताकि अपनी और दूसरों की जान बचा सके। वह उन लोगों की आवाज़ बन गई है जिनकी कोई आवाज़ नहीं है और उन लोगों की शुक्रगुज़ार हैं जिन्होंने उन्हें उम्मीद दी।

“मैं सिस्टर मेरी-पास्कालीन एकोसोनी और मेरी-जीन एलोंगा और येसु के पवित्र हृदय की सभी धर्मबहनों को मेरा स्वागत करने के लिए धन्यवाद देती हूँ। मैं समझ गई हूँ कि येसु का हृदय सभी का स्वागत करता है, और कभी-कभी, हममें उस हृदय के पास आने की हिम्मत नहीं होती जिसे हम चाहते हैं। मैंने समाज में अपनी जगह वापस पा ली है। आज, मैं सिर ऊँचा करके चलती हूँ। जो लोग मुझे वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे मैं हूँ, वे अब मेरे परिवार का हिस्सा हैं।”

स्वीकार करने और दया की अपील

श्रीमति नौचका का अनुभव इस बात का सबूत है कि किसी को भी उसकी बीमारी से नहीं पहचाना जा सकता। इस खुशकिस्मत और घायल दुनिया में, वास्तव में जिया गया प्यार, बिना शर्त स्वीकार करना और दया, ज़ख्मों को उम्मीद के रास्तों में बदल सकती है।

बिना शर्त स्वीकार करना ही पहला इलाज है। श्रीमति नौचका ने अंत में कहा, “मैं हज़ारों लोगों में जागरूकता बढ़ाने का सपना देखती हूँ और मैं एचआईवी/एड्स रहित दुनिया के लिए लड़ रही हूँ।”

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05 मई 2026, 12:15