कार्डिनल रेडक्लिफ : युद्ध समय, ख्रीस्तीय आशा के व्यक्ति बनने हेतु बुलाये गये हैं
वाटिकन न्यूज
यूक्रेन, मंगलवार, 3 मार्च 2026 (रेई) : दोमिनिकन कार्डिनल तिमोथी रेडक्लिफ स्थानीय कलीसिया और दोमिनिकन समुदायों के प्रति अपना समर्थन और एकजुटता दिखाने के लिए युद्ध से जूझ रहे यूक्रेन का दौरा कर रहे हैं।
वे 27 फरवरी को राजधानी कीव पहुँचे, जहाँ उन्होंने कीव-ज़ाइटॉमिर के धर्माध्यक्ष विताली क्रिवित्स्की से मुलाकात की, और युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों के लिए एक अस्थायी स्मारक का दौरा किया। इसके बाद उन्होंने 28 फरवरी से 1 मार्च तक एक आध्यात्मिक साधना में प्रवचन दिया, और अपनी बाकी दो हफ्ते की यात्रा अपने दोमिनिकन भाइयों से मिलने में बिताएँगे।
वाटिकन न्यूज के साथ एक साक्षात्कार में, उन्होंने अपनी यात्रा के शुरुआती दिनों और युद्ध के साथ आनेवाली अनिश्चितता और पीड़ा का सामना करते हुए ख्रीस्तीयों के लिए प्रार्थना करने और उम्मीद बनाए रखने की जरूरत पर चिंतन किया।
वाटिकन न्यूज : महामहिम, यूक्रेन की यह यात्रा और यूक्रेन के लोगों के साथ होना आपके लिए क्या अर्थ रखता है?
कार्डिनल रेडक्लिफ: मैं यूक्रेन में आकर बहुत खुश हूँ—एक ऐसा देश जहाँ मैं तीस साल पहले पहली बार गया आया था। मैं अपने भाइयों के बुलावे पर आया और खुशी-खुशी इसे स्वीकार कर लिया। जब भी मैं किसी ऐसे देश में जाता हूँ जहाँ दुःख है, तो मैं हमेशा कुछ न कुछ सीखता हूँ। इसलिए मैं सबसे पहले अपने भाइयों और बहनों के साथ रहने आया हूँ, लेकिन इसलिए भी क्योंकि मुझे यकीन है कि उनके पास मुझे सिखाने के लिए बहुत कुछ है।
सवाल: आप अपने साथ मुख्य संदेश क्या लेकर आए हैं?
मुझे लगता है कि जब कोई कहीं पहुँचता है, तो उसे पहले से बना-बनाया संदेश लेकर नहीं आना चाहिए। उसे सुनने के लिए आना चाहिए, और जो कहना है वह पहले लोगों को सुनने से पैदा होना चाहिए। इसलिए, मैं बोलने के लिए उतना नहीं आता जितना सुनने के लिए। यही सिनॉडालिटी का मूल है: हम उन लोगों के रूप में आते हैं जो सुनते हैं—ईश्वर को सुनते हैं और एक-दूसरे को सुनते हैं।
प्रश्न : कीव में आपके द्वारा संचालित आध्यात्मिक साधना की विषयवस्तु “हे पिता हमारे” को समर्पित थी। आपने इस विषयवस्तु को क्यों चुना?
इस दुःख और युद्ध की घड़ी में, प्रार्थना बहुत जरूरी है। प्रभु की प्रार्थना “हे पिता हमारे”, सभी प्रार्थनाओं में श्रेष्ठ है।
येसु ने खुद यह प्रार्थना तब की थी जब वे दुःख उठाने और मरने के लिए येरूसालेम जा रहे थे। उन्होंने यह प्रार्थना भविष्य को देखते हुए की थी—उस पल के लिए जब वे गेथसेमेनी के बगीचे में होंगे। इसलिए, हममें से हर एक के लिए, खासकर जब हम दुःख का सामना करते हैं, तो प्रभु की प्रार्थना एक बड़ा वरदान है।
सवाल: हम यहाँ कीव में रूसी गोलाबारी के बीच हैं, और हमारे भाई और आपके दोस्त लुकाज़ येरूसालेम में हैं। हम देखते हैं कि युद्ध का एक नया दौर शुरू हो गया है। क्या आप यूक्रेन और पवित्र भूमि की स्थिति पर टिप्पणी कर सकते हैं?
यह सच है: हम हर जगह बहुत ज्यादा हिंसा देख रहे हैं। यह एक ऐसा समय है जब कई जगहों पर युद्ध छिड़ रहे हैं—न केवल यूरोप या मध्य पूर्व में, बल्कि अफ्रीका में भी, जिसमें दक्षिण सूडान भी शामिल है। और पहले से कहीं ज्यादा, हमें एक ख्रीस्तीय साक्ष्य की जरूरत है कि शांति संभव है, कि युद्ध जरूरी नहीं है। युद्ध के समय में, हमें उम्मीद रखनेवाले लोग बनने के लिए कहा गया है।
मैं कहूंगा कि आज ख्रीस्तीयों का मुख्य संदेश आशा है। हमारा यूखरिस्तीय संस्कार ऐसे समय में शुरू किया गया था जब ऐसा लग रहा था कि कोई उम्मीद नहीं बची है—अंतिम व्यारी के दौरान, जब आगे सिर्फ मौत और हिंसा थी। ठीक उसी समय येसु ने खुद को दे दिया था। और यही हमारी आशा का महान संस्कार है। इसलिए, यूक्रेन या कहीं भी जहां युद्ध जारी है, वहां के लोगों के लिए मेरा एकमात्र संदेश यह है: हम अपनी आशा प्रभु में रखें। अंततः उनकी शांति की जात होगी।
सवाल: आपकी किताब “द सेवेन लास्ट वर्ड्स” – जो क्रूस पर ख्रीस्त के आखिरी सात वाक्यों पर केंद्रित है – यूक्रेनी में प्रकाशित हुई है। आप इसे कैसे बताएंगे?
यह छोटी सी किताब सिनॉडालिटी विषय से बहुत करीब से जुड़ी है—एक-दूसरे को सुनना सीखने से। हिंसा के समय, कान बंद करने का लालच होता है। लेकिन हमें सुनना चाहिए। हमारे समुदायों में, इंसान होने के नाते, हम एक-दूसरे को सुनते हैं—खासकर जब हम असहमत होते हैं। असहमति में ही हम एक-दूसरे से सीख सकते हैं। हमारी दुनिया ऐसे नारों से भरी है जिनमें लोग सच में सोचने या दूसरों के लिए खुद को खोलने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। इसके बजाय, ईश्वर का बुलावा है कि हम अपने मन और हृदय को खोलें।
इसीलिए, युद्ध के समय में, सिनॉडल का रास्ता जरूरी है। जनवरी में रोम में कनसिस्ट्री के दौरान, सभी कार्डिनल एक साथ इकट्ठा हुए, और सबसे पहली चीज जो पोप लियो चाहते थे, वह यह थी कि हम एक-दूसरे की बात सुनें ताकि वे हमें सुन सकें। मेरा मानना है कि यह हिंसा से भरी दुनिया के लिए कलीसिया का एक बड़ा वरदान है। हम न सिर्फ अपने कानों और दिमाग से सुनते हैं, बल्कि अपनी कल्पना से भी सुनते हैं। क्या हम सोच सकते हैं कि दूसरे हमसे अलग क्यों सोचते हैं?
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